Follow by Email

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

आख़िरी गाडी़ गुज़रने की सदा भी आ गई

(87)
आख़िरी गाडी़ गुज़ने की सदा भी आ गई
सो रहो बेख़्वाब आँखों! रात आधी आ गई

ज़िंदगी से सीख लीं हमने भी दुनियादारियाँ
रफ़्ता-रफ़्ता तुममें भी मौक़ापरस्ती आ गई

सादा-लौही*, देन जो क़स्बे भी थी रूख़सत हुई
शहर आना था कि उसमें होशियारी आ गई

हम मिले थे जाने क्या आफ़त-ज़दा रूहें लिए
गुफ़्तगू औरों की थी, आपस में तल्ख़ी* आ गई

आज अपने गाँव की हद पर पहुँचते हैं तो हम
पूछते हैं हमसफर ये कौन सी बस्ती आ गई

तर्क क्यों करते नहीं हो, कारोबारे-आरज़ू
'ख़ानक़ाही' अब तो बालों पे सफेदी आ गई

1-- सादा-लौही--सरलता
2--तल्ख़ी--कड़वाहट

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

'बस्ती-बस्ती देखता था कर्बला होते हुए'

(86)
बस्ती-बस्ती देखता था कर्बला होते हुए
कितना बे-परवा था वो सबका ख़ुदा होते हुए

मैं कि हूँ हालात के तूफाँ में तिनके की तरह
मेरी मजबूरी समझ मुझसे ख़फ़ा होते हुए

ये भी क्या हर ज़ुल्म सह लेना सबब पूछे बग़ैर
जु्र्म का इक़बाल करना बे-ख़ता होते हुए

हम भी अपने तन की उर्मानी* पे थे नाज़ाँ बहुत
वो भी शर्माया न अबके बेक़बा* होते हुए

वो अज़ब इक शख़्स है, आसान भी दुश्वार भी
देर कब लगती है उसको मस्अला होते हुए

एक ही झोंका हवा का दोस्त भी, दुश्मन भी है
सोचता था हर नया पत्ता हरा भी होते हुए
1-उर्मानी--नग्नता
2-बेक़बा- निर्वस्त्र

'दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा'

(85)
बे-दिशाई के अंधेरे सिलसिले आने को हैं
अब के इस जंगल में बीहड़ रास्ते आने को हैं

बस्तियों में भाव ख़ेमों* के बहुत ऊँचे हुए
क्या कहीं से फिर मुहाजिर* क़ाफिले आने को हैं

जिनकी पैमाइश,न जिन पर वक़्त की कोई ग़िरफ़्त
है सफ़र ज़िंदा तो वे भी फ़ासले आने को हैं

दर्द बातिल* हो चुका, आँसू तअस्सुर* खो चुके
अब मेरे होठों पे वहशी क़हक़हे आने को हैं

दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा
आगे-आगे और लंबे रतजगे आने को हैं
1-कैंप
2-शरणार्थी
3-झूठा
4-प्रभाव

'गुमराही में कौन अब घर का पता देगा मुझे'

(84)
गुमराही में कौन अब घर का पता देगा मुझे
कौन अब मायूसियों में हौसला देगा मुझे

सल्ब* हो जाएँगे जब ग़म से मेरे होशो-हवास
कौन सरहाने मेरे आकर सदा देगा मुझे

कौन अब रक्खेगा मुझको अपनी तस्बीहों* में याद
कौन अब रातों को जीने की दुआ देगा मुझे

भीग जाएगी पसीने से जो पेशानी मेरी
कौन अपने नर्म आँचल की हवा देगा मुझे

कौन अब पूछेगा मुझसे मेरी माजरी का हाल
कौन बीमारी में ज़िद करके दवा देगा मुझे

आस्माँ पहले छिना था, अब ज़मीं भी छिन गई
देने वाला इससे गहरा ज़ख़्म क्या देगा मुझे
1-सल्ब--लुप्त
2-तस्बीहों-माला

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

'फूल जो कल मुझमें खिलने थे, क़यासी* हो गए'

(83)
फूल जो कल मुझमें खिलने थे, क़यासी* हो गए
अब यहाँ पतझड़ के मौसम, बारहमासी हो गए

रात तक था जिनको अपनी ताज़ाकरी का घमंड
सुबह का सूरज जो निकला लोग बासी हो गए

इस बरस फागुन में ऐसी बर्फ़ बरसी है कि बस
आत्माएँ सुन्न हुई, चेहरे कपासी हो गए

घर से बेघर कर गया कितनों को जबरे-रोज़गार*
सब पुराने हम-सबक* परदेसवासी हो गए

सिर्फ़ बाक़ी रह गया बे-लौस रिश्तों का फ़रेब
कुछ मुनाफ़िक* हम हुए, कुछ तुम सियासी हो गए

1- क़यासी*--काल्पनिक
2- जबरे-रोज़गार*--रोज़गार की मजबूरी
3- हम-सबक--सहपाठी
4-मुनाफ़िक*--पाखंडी

'क्या कहेगी कौन तन्हा छोड़कर आया उसे'

(82)
क्या कहेगी कौन तन्हा छोड़कर आया उसे
क़ब्र की तारीकियों में होश ग़र आया उसे

रोकती ही रह गईं ममता-भरी बाहें मेरी
गोद ही धरती की अपना घर नज़र आया उसे

जिसमें महसूसात* की ख़ुशबू, न आवाज़ों के फूल
रास यह कैसे ख़राबे का सफ़र आया उसे

रस्मों-राहे-मेज़बानी* ख़त्म थी जिस पर कभी
अजनबी लगता है अब मेहमान घर आया उसे

जिसके रूख़* पर थी मुझे गर्दे-सफ़र भी नागवार
अपने हाथों से सपुर्दे-ख़ाक कर आया उसे

1-महसूसात*--अनुभूतियाँ
2-रस्मों-राहे-मेज़बानी*--अतिथियों का आदर-सत्कार
3-रूख़* --चेहरा

'ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से'

(81)
ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से
हज़ार बार उम्मतें* गुज़र चुकीं अज़ाब से

ये दिल में था कि आज शब बिताएँ अपने साथ हम
निकल-निकल के आ गई इबारतें किताब से

गुज़र रहा हूँ तिशना-लब* मैं ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* से
मुझी में हैं बिछे हुए क़दम-क़दम सराब* से

मकाँ वहीं हैं शहर में, मगर मकीं* नहीं हैं वो
किसे ख़बर कहाँ गए, वो ख़ुश-बदन गुलाब से

लगा कि जिस्मों-रूह में भड़क उठी है आग फिर
जनम-जनम कि तिश्नगी बुझी कहाँ शराब से

1- उम्मतें*--राष्ट्र
2- तिशना-लब*--प्यासा
3- ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* --जीवन के स्वप्नलोक से
4- सराब* --बादल
5- मकीं*--मकानों के निवासी

'चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे'

चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे
चल रही थी आँधियाँ, पत्ते सदा* करते न थे

मुतमइन* थे एहले-मक़तल*, नीम-जाँ* करके मुझे
कैसी होशियारी थी सर तन से जुदा करते न थे

हमको किस शब जिंदा रहने की हवस होती न थी
दिन में कब हम ख़ुदकुशी का फ़ैसला करते न थे

बंद था जिसमें मेरी आँखों का सागर बूँद-बूँद
मेरे ख़ेतों को वो बादल भी हरा करते न थे

कैसे दूर-अंदेश* मुंसिफ थे कि इंसाफ़ न मुझे
मानते थे बेख़ता लेकिन रिहा करते न थे।

1- सदा*--आवाज़
2- मुतमइन*--संतुष्ट
3- एहले-मक़तल*--वधस्थल के लोग
4- नीम-जाँ*--मरणासन्न
5- दूर-अंदेश*--दूरदर्शी

बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

'अब तमाशा देखने वालों में हमसाया भी है'

(79)
इल्म किसको था कि तरसीले-हवा* रूक जाएगी
अगले मौसम तक मेरी नशवो-नुमा* रूक जाएगी

तू ही क्यों नादिम* है इतनी मेरे घर की आबरू
किसके सर पर ऐसी आँधी में रिदा* रुक जाएगी

अब तमाशा देखने वालों में हमसाया भी है
टूटती छत मेरे चिल्लाने से क्या रूक जाएगी

कल न होगा कोई इस बस्ती में मेरे मंतज़िर
कल मेरे तलुओं ही में आवाज़े-पा* रुक जाएगी

क्या तहफ़्फ़ज़* दे सकेगी मुझको बज़-ए-एहतियात
क्या दरीचे मूँद लेने से बला रुक जाएगी

1- तरसीले-हवा*-- हवा की उपलब्धि
2- नशवो-नुमा*--बढत
3- नादिम*--लज्जित
4- रिदा*--चादर
5- आवाज़े-पा*--पदचाप
6- तहफ़्फ़ज़*--सुरक्षा
7- बज़-ए-एहतियात--सावधानी का अंदाज़

'रूख पे भूली हुई पहचान का डर तो आया'

(78)
रूख पे भूली हुई पहचान का डर तो आया
कम-से-कम भीड़ में इक शख़्स नज़र तो आया

मेरे सीने की तरफ़ खुद मेरे नाख़ुन लपके
आखि़र इस ज़ख़्म की टहनी पे समर तो आया

कट गया मुझसे मेरी ज़ात का रिश्ता लेकिन
मुझको इस शहर में जीने का हुनर तो आया

कुछ तो सोए हुए एहसास के बाज़ू थिरके
पाँव से उठके भँवर ता-ब-कमर तो आया

तन की मिट्टी में उगा ज़हर का पौधा चुपचाप
मुझमें बदली हुई दुनिया का असर तो आया

1- समर --फल
2- ता-ब-कमर--कमर तक

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

'रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था'

(77)
रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे, मगर ऐसा भी था

लौट आती थीं कई साबिक़* पतों की चिट्ठियाँ
घर बदल देते थे बाशिंदे, नगर ऐसा भी था

वो किसी का भी न था लेकिन था सबका मोतबर*
कोई क्या जाने कि उसमें इक हुनर ऐसा भी था

तोलता था इक को इक अशयाए-मशरफ़*  की तरह
दोस्ती थी और अंदाज़े-नज़र ऐसा भी था

पाँव आइंदा*  की जानिब, सर गुजिश्ता*  की तरफ़
यों भी चलते थे मुसाफिर, इक सफ़र ऐसा भी था

हर नई रूत में बदल जाती थी तख़्ती नाम की
जिसको हम अपना समझते कोई घर ऐसा भी था

1-पुराने
2-विश्वसनीय
3-उपयोग की वस्तुएं
4-भविष्य
5-अतीत

'वो रेगिस्तान ले जाते तो सागर छोड़ जाते थे'

(76)
मुसाफ़िर-ख़ाना-ए-इम्काँ* में बिस्तर छोड़ जाते थे
वो हम थे जो चिरागों को मुनव्वर* छोड़ जाते थे

गरज़तें-गूँजते आते थे जो सुनसान सहरा में
वही बादल अजब वीरान मंज़र छोड़ जाते थे

न थी मालूम भूखी नस्ल की मजबूरियाँ उनको
फटी चादर वो तलवारों के ऊपर छोड़ जाते थे

नहीं कुछ एतबार अब क़ुफ़्लों -दरबाँ* का,कभी हम भी
पड़ोसी के भरोसे पर खुला घर छोड़ जाते थे

कभी आँधी का ख़दशा*  था, कभी तूफाँ का अंदेशा
वो रेगिस्तान ले जाते तो सागर छोड़ जाते थे

1-संभावनाओं का यात्री घर
2- रोशन
3-ताले और चौकीदार
4-आशंका

'सामने परबत भी हैं, कुछ लोग कहते आए थे'

(75)
सामने परबत भी हैं, कुछ लोग कहते आए थे
हम तो बस हमवार मैदानों में बहते आए थे

अब की बरखा कर गई मिस्सार तो हैरत ही क्या
यो दरो-दीवार तो बरसों से ढहते आए थे

आख़िर-आख़िर अब वही मेआर* ठहरा जीस्त का
लोग जिस अंदाज़ को मायूब कहते आए थे

कौन जाने किसलिए चूल्हे का ईंधन बन गए
ये शजर*तो मौसमों की मार सहते आए थे

अब के क्या अदबार* आया, ख़्वाब तक गहना गए
चाँद, सूरज तो हमेशा से ही गहते आए थे
1-स्तर
2-दूषित
3-अशुद्ध
4-संकट, विपदा

'वो जो पल ख़ाली हुआ, मर कर बसर मेरा हुआ'

(74)
इस तरह हर मरहला* ना-मोतबर*मेरा हुआ
पाँव गोया दूसरों के थे, सफ़र मेरा हुआ

उसका सन्नाटा ग़ज़ब था, इसका हंगामा ग़ज़ब
दश्त कब मेरा हुआ था, कब नगर मेरा हुआ

यों लगा जैसे मैं आवाज़ों के इक जंगल में हूँ
जब कभी शहरे-ख़मोशाँ*से गुज़र मेरा हुआ

कुछ तो दो शहरे-हवस में दाद इस किरदार*की
कल जो था सफ़्फ़ाक दुश्मन, चारागर*मेरा हुआ

दोस्तों! औकात-बेकरारी को फुर्सत मत कहो
वो जो पल ख़ाली हुआ, मरकर बसर मेरा हुआ

1-मंज़िल के लिए कूच
2-अविश्वसनिय
3-कब्रिस्तान
4-चरित्र
5-उपचारक

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

'देखा नहीं देखे हुए मंज़र के सिवा कुछ'

(73)
देखा नहीं देखे हुए मंज़र के सिवा कुछ
हासिल न हुआ सैरे-मुकर्रर* के सिवा कुछ

किस हाल में उस शोख़ से वाबस्ता हुआ दिल
सौगात में देने को नहीं सर के सिवा कुछ

क्यों गर्द-सी उड़ती है ये हर लम्हा रगों में
क्या जिस्म के अंदर नहीं सरसर* के सिवा कुछ

फूलों से बदन डूबते देखे गए हर बार
इस बहर* में तैरा नहीं पत्थर के सिवा कुछ

करते भी तलब क्या कि यहाँ दस्ते अता* में
देने को न था जिन्से-मयस्सर* के सिवा कुछ

1- सैरे-मुकर्रर*--एक ही स्थान पर दुबारा
2- उपहार
3-सरसर*--आँधी
4-बहर*--सागर
5-दस्ते अता*--दया का हाथ
6-जिन्से-मयस्सर*--पहले से प्राप्त वस्तु

'दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती'

(72)
शज़र* आँगन का जब सूरज से लरज़ा* होने लगता था
कोई साया मेरे घर का निगहबाँ* होने लगता था

दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती
अक़ीदों* के अंधेरे में चिरागाँ होने लगता था

पुराने पेड़ फिर ताज़ा फलों से लदने लगते थे
गए मौसम से दिल जब भी गुरेज़ाँ* होने लगता था

चुनौती देने लगती थी नई दुशवारियाँ मुझको
सफ़र जब ज़िंदगी का मुझ पे आसाँ होने लगता था

बताऊँ क्या कि कैसा बा-मुरव्वत शख़्स था वो भी
मुझे इलज़ाम देकर ख़ुद पशेमाँ* होने लगता था

1-शज़र*--वृक्ष
2-लरज़ा*--कंपित
3-निगहबाँ*--रक्षक
4-गुरेज़ाँ*--आस्थाओं
5-बा-मुरव्वत--उदासीन
6-पशेमाँ*--लज्जित

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

'अच्छे दिनों की आस में दीवारों-दर हैं चुप'

(71)
सामान दिलदही* का न राहत घरों में है
दिन-रात का सफ़र है, सकूनत* घरों में है

दस्तक पे दोस्तों के भी खुलते नहीं हैं दर
हर वक़्त इक अजीब-सी दहशत घरों में है

क्या फिर कहीं पे कोई बड़ा हादिसा हुआ
क्यों आज इतनी भीड़ इबादत-घरों में है

बुनियाद इख़्तलाफ़* की कुछ भी नहीं मगर
मौजूद बेसबब-सी रक़ाबत* घरों में है

अच्छे दिनों की आस में दीवारों-दर हैं चुप
सड़कों पे कहक़हे हैं, हक़ीक़त घरों में है

जंगल में जा बसेंगे अगर आफ़ियत मिले
अब तक यक़ीन था कि हिफ़ाज़त घरों में है

1- दिलदही* --मन-बहलाव
2- सकूनत*आवास
3- इख़्तलाफ़*--मतभेद
4- रक़ाबत*शत्रुता

'वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था'

(70)
ज़िंदगी को ज़र-ब-कफ़*, ज़र-फ़ाम* करना सीखते
कौन था वो, किससे हम आराम करना सीखते

वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था
सरफिरी शामों को नज़रे-जाम करना सीखते

सीख लेते काश हम भी कोई कारे-सूद-मंद*
शेर-गोई छोड़ देते, काम करना सीखते

ख़ुद-ब-ख़ुद तय हो गए शामों-सहर अच्छा था मैं
सुबह करना सीख लेते, शाम करना सीखते

क़द्र है जब शोरो-ग़ोग़ा* की तो हज़रत आप भई
गीत क्यों गाते रहे, कोहराम करना सीखते

1- ज़र--कफ़--मुट्ठियों में सोना
2- ज़र-फ़ाम*--सोने जैसा रंग
3- कारे-सूद-मंद*--लाभदायक
4- शोरो-ग़ोग़ा*--शोर-शराबा

'नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके'

(69)
नदी के सय्याल* रास्ते से लहू में चुपचाप हल हुआ दिन
ग़रूब* के वक़्त आस्माँ के किनारे-ज़ेरी* में खूँ-शुदा* दिन

मथी हुई मिट्टियों के अंदर छुपी हुई है शबीह* मेरी
मैं एक से दूसरी तरफ़ के सफ़र में हूँ दरदियान का दिन

तुम्हें भी तन्हाइयों में अपनी शरीक करना कहाँ था मुमकिन
कि सर्द बिस्तर पे रात मेरे बदन-बरहना* पड़ा रहा दिन

नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके
घरों में काफ़ूर जैसी शामें, सफ़र में हलका सहाब-सा दिन

उदास कमरे में अपने तन्हा, बख़ील* लम्हों से लौ लगाते
इक और हमने गुज़ार दी शब, इक और हमने गँवा दिया दिन

1- सय्याल*--तरल
2- ग़रूब* --सूर्यास्त
3- किनारे-ज़ेरी*--निचले किनारे
4- खूँ-शुदा* --खून में परिवर्तित
5- शबीह*-- सूरत
6- बदन-बरहना* --नग्न
7- बख़ील*--कंजूस

'ऐ जंगल की बेमानी चुप, शहरों के दीवाने शोर'

(68)
ऐ-जाँ! कब तक क़ता* न होता, झूठा-सच्चा साथ तेरा
कमज़ोर पतंग बारीक हुआ, बिलाख़िर छूटा साथ तेरा

कैसे मुमकिन तुझसे बचना, चारों खूँट ऐ बहती हवा
सहरा-सहरा संगत तेरी, रस्ता-रस्ता साथ तेरा

उड़ते जाते वक़्त बता अनजाने पन का भेद है क्या
मेरी तबीअत ज्यों की त्यों और बदला-बदला साथ तेरा

ऐ जंगल की बेमानी चुप, शहरों के दीवाने शोर
बेकार गिला तन्हाई का ख़ुद हमने छोड़ा साथ तेरा

इक रूख़ तेरा दिलकश इतना, इक रूख़ नामरग़ूब* बहुत
लेकिन मेरी आदत ठहरा, कड़ुआ-मीठा साथ तेरा

1- क़ता* --विच्छेद
2- नामरग़ूब* --अस्वीकार्य

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

'कौन आएगा यहाँ लेके सँदेशा उसका '


(67)
कौन आएगा यहाँ लेके सँदेशा उसका
खुशकुशी कर भी चुका पाक फ़रिश्ता उसका

अपने पहलू में खिलाता है वो हर शब कोई फूल
सुबह से पहले भुला देना है चेहरा उसका

ऐब की तरह न खुलना है महारत उसकी
बरमला प्यार का इज़हार है पेशा उसका

बेल-आकाश कि होकर भी न हो जुज़्बे-दरख़्त*
जिंदा रहने का ये उस्लूब* अनोखा उसका

बे-रिया* था तो कभी सख़्त भी होता वो शख़्स
वजह रंजिश की है सैयाल* रवैया उसका

1-वृक्ष का भाग
2-शैली
3-निश्छल
4-तरल

'शहर की भीड़ से भागूँ तो है सहरा दरपेश'


(66)
शहर की भीड़ से भागूँ तो है सहरा दरपेश
नफ़अ* के नाम पे इक और ख़सारा दरपेश

थक के बाज़ार से लौटा हूँ तो घर सामने है
यानी तन्हाई को इक और ख़राबा* दरपेश

शुक्र करता था कि बादल तो धुँए का गुज़रा
अब है इक आग उगलता हुआ दरिया दरपेश

लफ़्ज़ को चीरूँ तो इक मुर्दा सदाक़त* मौजूद
आँख खोलूँ तो है मरता हुआ लम्हा दरपेश

आइना सौंप रहा है मेरा चेहरा मुझको
जिससे भागा था ये दिल है वही नक़्शा दरपेश
1- लाभ
2-वीराना
3-यथार्थ

'छत से उतरा साथी इक'



(65)
छत से उतरा साथी इक
मैं और नन्हा पंछी इक

सूरज निकला पाया क्या
गुमसुम रात की रानी इक

जीवन शहर दरिंदों का
याद अकेली नारी इक

सारे घर को खोले कौन
सत्तर ताले, चाबी इक

रोगी काया, बरखा रूत
तन पर भीगी कमली इक

ख़ुद में तुझको जोड़ूँ आ
मैं भी एक हूँ, तू भी इक

'आँगन आँगन फिरते देखी, सूरज जैसी चीज़ कोई'

(64)
क़रिया-ए-इम्काँ*, आग सफ़र की, जज़्बा, सहरा-गर्द* मिला
मुश्किल हर उफ़ताद* थी लेकिन, सहने मेंदिन फ़र्द* मिला

बरसों-बरसों रहते हुए भी, घर के एक अहाते में
ख़्वाब की औऱत मुझको मिली और उसको ख़्याली मर्द मिला

आँगन आँगन फिरते देखी, सूरज जैसी चीज़ कोई
लेकिन जब-जब झाँक के देखा, मौसम घर का सर्द मिला


दश्ते-बदन* में पिन्हाँ पाई कैसी बे-तिस्कीनी-सी*
टूट के ख़ुद को चाहने वाला दिनभर कूचा गर्द* मिला

हँसते-हँसते याद दिलाई उसने पुराने जख़्मों की
बरसों बाद अचानक हमको शहर में इक हमदर्द मिला

1-संभावनाओं का शहर
2-जंगल-जंगल भ्रमण करने वाला
3-विपत्ति
4-बेजोड़
5-अस्तित्व के वन में
6-व्यग्रता
7-गली-गली भटकने वाला

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

'लोग पुकारे जाएँगे, जब नाम से अपनी माओं के'

(63)
रोगी ज़ौजा*, घोर थकन, ख़्वाब-आवर* जुर्रे* से आगाह
मैं तो नहीं हूँ, वो तो होगा, उलझे रिश्ते से आगाह

बीज में सपना जैसी कोंपल, ऊपर सूखा मरता फूल
धुंध में बे-आसारी को मैं गिरते मलबे से आगाह

लोग पुकारे जाएँगे, जब नाम से अपनी माओं के
उस दिन शायद कोई न होगा नुत्फ़े* से आगाह

बंद दुकान ये दारू की और उसके आगे रूकता मैं
मुर्दा नींदें काश न होतीं अपने नुसख़े से आगाह

नाज़ेबा* बातों पर अपनी हम ख़ुद लज़्ज़त लेते थे
नाख़ुश-नाख़ुश लोग कहाँ थे निस्फ़* दरिंदे से आगाह

1- रोगी ज़ौजा--बीवी, पत्नी
2- ख़्वाब-आवर--नींद लाने वाला
3- जुर्रे* --घूँट
4-परिचित
5-नुत्फ़े*--गर्भ
6-नाज़ेबा*--अशोभनीय
7-निस्फ़--अर्द्ध