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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

'बस्ती-बस्ती देखता था कर्बला होते हुए'

(86)
बस्ती-बस्ती देखता था कर्बला होते हुए
कितना बे-परवा था वो सबका ख़ुदा होते हुए

मैं कि हूँ हालात के तूफाँ में तिनके की तरह
मेरी मजबूरी समझ मुझसे ख़फ़ा होते हुए

ये भी क्या हर ज़ुल्म सह लेना सबब पूछे बग़ैर
जु्र्म का इक़बाल करना बे-ख़ता होते हुए

हम भी अपने तन की उर्मानी* पे थे नाज़ाँ बहुत
वो भी शर्माया न अबके बेक़बा* होते हुए

वो अज़ब इक शख़्स है, आसान भी दुश्वार भी
देर कब लगती है उसको मस्अला होते हुए

एक ही झोंका हवा का दोस्त भी, दुश्मन भी है
सोचता था हर नया पत्ता हरा भी होते हुए
1-उर्मानी--नग्नता
2-बेक़बा- निर्वस्त्र

'दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा'

(85)
बे-दिशाई के अंधेरे सिलसिले आने को हैं
अब के इस जंगल में बीहड़ रास्ते आने को हैं

बस्तियों में भाव ख़ेमों* के बहुत ऊँचे हुए
क्या कहीं से फिर मुहाजिर* क़ाफिले आने को हैं

जिनकी पैमाइश,न जिन पर वक़्त की कोई ग़िरफ़्त
है सफ़र ज़िंदा तो वे भी फ़ासले आने को हैं

दर्द बातिल* हो चुका, आँसू तअस्सुर* खो चुके
अब मेरे होठों पे वहशी क़हक़हे आने को हैं

दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा
आगे-आगे और लंबे रतजगे आने को हैं
1-कैंप
2-शरणार्थी
3-झूठा
4-प्रभाव

'गुमराही में कौन अब घर का पता देगा मुझे'

(84)
गुमराही में कौन अब घर का पता देगा मुझे
कौन अब मायूसियों में हौसला देगा मुझे

सल्ब* हो जाएँगे जब ग़म से मेरे होशो-हवास
कौन सरहाने मेरे आकर सदा देगा मुझे

कौन अब रक्खेगा मुझको अपनी तस्बीहों* में याद
कौन अब रातों को जीने की दुआ देगा मुझे

भीग जाएगी पसीने से जो पेशानी मेरी
कौन अपने नर्म आँचल की हवा देगा मुझे

कौन अब पूछेगा मुझसे मेरी माजरी का हाल
कौन बीमारी में ज़िद करके दवा देगा मुझे

आस्माँ पहले छिना था, अब ज़मीं भी छिन गई
देने वाला इससे गहरा ज़ख़्म क्या देगा मुझे
1-सल्ब--लुप्त
2-तस्बीहों-माला

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

'फूल जो कल मुझमें खिलने थे, क़यासी* हो गए'

(83)
फूल जो कल मुझमें खिलने थे, क़यासी* हो गए
अब यहाँ पतझड़ के मौसम, बारहमासी हो गए

रात तक था जिनको अपनी ताज़ाकरी का घमंड
सुबह का सूरज जो निकला लोग बासी हो गए

इस बरस फागुन में ऐसी बर्फ़ बरसी है कि बस
आत्माएँ सुन्न हुई, चेहरे कपासी हो गए

घर से बेघर कर गया कितनों को जबरे-रोज़गार*
सब पुराने हम-सबक* परदेसवासी हो गए

सिर्फ़ बाक़ी रह गया बे-लौस रिश्तों का फ़रेब
कुछ मुनाफ़िक* हम हुए, कुछ तुम सियासी हो गए

1- क़यासी*--काल्पनिक
2- जबरे-रोज़गार*--रोज़गार की मजबूरी
3- हम-सबक--सहपाठी
4-मुनाफ़िक*--पाखंडी

'क्या कहेगी कौन तन्हा छोड़कर आया उसे'

(82)
क्या कहेगी कौन तन्हा छोड़कर आया उसे
क़ब्र की तारीकियों में होश ग़र आया उसे

रोकती ही रह गईं ममता-भरी बाहें मेरी
गोद ही धरती की अपना घर नज़र आया उसे

जिसमें महसूसात* की ख़ुशबू, न आवाज़ों के फूल
रास यह कैसे ख़राबे का सफ़र आया उसे

रस्मों-राहे-मेज़बानी* ख़त्म थी जिस पर कभी
अजनबी लगता है अब मेहमान घर आया उसे

जिसके रूख़* पर थी मुझे गर्दे-सफ़र भी नागवार
अपने हाथों से सपुर्दे-ख़ाक कर आया उसे

1-महसूसात*--अनुभूतियाँ
2-रस्मों-राहे-मेज़बानी*--अतिथियों का आदर-सत्कार
3-रूख़* --चेहरा

'ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से'

(81)
ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से
हज़ार बार उम्मतें* गुज़र चुकीं अज़ाब से

ये दिल में था कि आज शब बिताएँ अपने साथ हम
निकल-निकल के आ गई इबारतें किताब से

गुज़र रहा हूँ तिशना-लब* मैं ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* से
मुझी में हैं बिछे हुए क़दम-क़दम सराब* से

मकाँ वहीं हैं शहर में, मगर मकीं* नहीं हैं वो
किसे ख़बर कहाँ गए, वो ख़ुश-बदन गुलाब से

लगा कि जिस्मों-रूह में भड़क उठी है आग फिर
जनम-जनम कि तिश्नगी बुझी कहाँ शराब से

1- उम्मतें*--राष्ट्र
2- तिशना-लब*--प्यासा
3- ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* --जीवन के स्वप्नलोक से
4- सराब* --बादल
5- मकीं*--मकानों के निवासी

'चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे'

चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे
चल रही थी आँधियाँ, पत्ते सदा* करते न थे

मुतमइन* थे एहले-मक़तल*, नीम-जाँ* करके मुझे
कैसी होशियारी थी सर तन से जुदा करते न थे

हमको किस शब जिंदा रहने की हवस होती न थी
दिन में कब हम ख़ुदकुशी का फ़ैसला करते न थे

बंद था जिसमें मेरी आँखों का सागर बूँद-बूँद
मेरे ख़ेतों को वो बादल भी हरा करते न थे

कैसे दूर-अंदेश* मुंसिफ थे कि इंसाफ़ न मुझे
मानते थे बेख़ता लेकिन रिहा करते न थे।

1- सदा*--आवाज़
2- मुतमइन*--संतुष्ट
3- एहले-मक़तल*--वधस्थल के लोग
4- नीम-जाँ*--मरणासन्न
5- दूर-अंदेश*--दूरदर्शी