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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

'चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे'

चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे
चल रही थी आँधियाँ, पत्ते सदा* करते न थे

मुतमइन* थे एहले-मक़तल*, नीम-जाँ* करके मुझे
कैसी होशियारी थी सर तन से जुदा करते न थे

हमको किस शब जिंदा रहने की हवस होती न थी
दिन में कब हम ख़ुदकुशी का फ़ैसला करते न थे

बंद था जिसमें मेरी आँखों का सागर बूँद-बूँद
मेरे ख़ेतों को वो बादल भी हरा करते न थे

कैसे दूर-अंदेश* मुंसिफ थे कि इंसाफ़ न मुझे
मानते थे बेख़ता लेकिन रिहा करते न थे।

1- सदा*--आवाज़
2- मुतमइन*--संतुष्ट
3- एहले-मक़तल*--वधस्थल के लोग
4- नीम-जाँ*--मरणासन्न
5- दूर-अंदेश*--दूरदर्शी

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