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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

'वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था'

(70)
ज़िंदगी को ज़र-ब-कफ़*, ज़र-फ़ाम* करना सीखते
कौन था वो, किससे हम आराम करना सीखते

वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था
सरफिरी शामों को नज़रे-जाम करना सीखते

सीख लेते काश हम भी कोई कारे-सूद-मंद*
शेर-गोई छोड़ देते, काम करना सीखते

ख़ुद-ब-ख़ुद तय हो गए शामों-सहर अच्छा था मैं
सुबह करना सीख लेते, शाम करना सीखते

क़द्र है जब शोरो-ग़ोग़ा* की तो हज़रत आप भई
गीत क्यों गाते रहे, कोहराम करना सीखते

1- ज़र--कफ़--मुट्ठियों में सोना
2- ज़र-फ़ाम*--सोने जैसा रंग
3- कारे-सूद-मंद*--लाभदायक
4- शोरो-ग़ोग़ा*--शोर-शराबा

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