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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

'दो चार राही पास-पास'

(19)
सिलवटें ही सिलवटें हैं टेढ़ी-मेढ़ी पास-पास
घर है जंगल और दीवारें हैं इतनी पास-पास

खा गया दोनों की आख़िर इक अजब ज़हराबे-तल्ख़*
साँस लेते आ रहे थे, झील नगरी पास-पास

सिर्फ़ इक पतली गली ही दरमियाँ है, देखिए
वज़अ-शाही, फ़ाकामस्ती और दिल्ली पास-पास

बूढ़ा बरगद, छाँव और कारें धुआँ देती हुईं
बैठ जाते हैं कभी दो चार राही पास-पास

और किसने इस तरह काटी है अपनी जिन्दगी
जैसे इक बिस्तर पे दो बच्चे हों, जिद्दी पास-पास

इतनी मुद्दत बाद आया है तो यों मुझको न देख
देख दुनियादार और मजबूर योगी पास-पास

1-ज़हराबे-तल्ख़*--विषाक्त जल

बुधवार, 3 अगस्त 2011

'जो आँखों से गुज़रा नहीं'

(18)
आने वाले दिनों को भी हम जी चुके
अब यहाँ कोई मौसम अनोखा नहीं
आओ अब अपने बिस्तर लपेटें, चलो
उस नगर में जो आँखों से गुज़रा नहीं

पत्तियाँ झड़ गई, फूल मुरझा गए,
कितना सुनसान है पेड़ एहसास का
इसकी शाख़ों पे जिसका बसेरा था कल
वो परिंदा भी तो आज लौटा नहीं

जिसको दुश्मन कहूँ कोई ऐसा नहीं
अब तो जो भी मेरा बही-ख़्वाह* है
ये जो हर साँस पीने पे मजबूर हूँ
मैंने ये ज़हर ख़ुद तो ख़रीदा नहीं

इश्तहाओं* के बे-वर्ग सहारा* में अब
गुमशुदा लज़्ज़ते ढूँढ़ती है जबाँ
ऐ ज़मीं! तेरे दामन में वो फल भी है
जायक़ा जिसका दुनिया ने चखा नहीं

अपने पुरखों का वारिस हूँ फिरता हूँ मैं,
दर-ब-दर अपनी झोली में डाले हुए
सारे सिक्के जो टकसाल बाहर हुए,
सारे अलफ़ाज़ वो जिनके माना* नहीं

1- बही-ख़्वाह*--हितैषी, शिभचिंतक
2- बे-वर्ग सहारा* --भूख, इच्छा
3- इश्तहाओं*--वीरान जंगल
4- माना*--अर्थ

'मुक़द्दर का लिखा हूँ मैं'

(17)
अपने ही खेत की मिट्टी से जुदा हूँ मैं तो
इक शरारा हूँ कि पत्थर से उगा हूँ मैं तो

मेरा क्या है, कोई देखे कि न देखे मुझको
सुबह के डूबते तारे की ज़ियां* हूँ मैं तो

अब यह सूरज मुझे सोने नहीं देगा शायद
सिर्फ़ इक रात की लज़्ज़त का सिला* हूँ मैं तो

वो जो शोलों से जले उनका मुदावा* है यहाँ
मेरा क्या ज़िक्र कि शबनम से जला हूँ मैं तो

तुम जो चाहो भी तो फिर सुन न सकोगे मुझको
दूर जाते हुए क़दमों की सदा हूँ मैं तो

कौन रोकेगा तुझे दिन की दहकती हुई धूप
बर्फ़ के ढेर पे चुपचाप खड़ा हूँ मैं तो

लाख मोहमल* सही पर कैसे मिटाएगी मुझे
जिन्दगी! तेरे मुक़द्दर का लिखा हूँ मैं तो

1- ज़ियां--रोशनी
2- सिला*--परिणाम
3- मुदावा*--उपचार
4- मोहमल*--अर्थहीन

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

'ऐसे सपने कौन बुने'

(16)
शहर बरहना*, गुंग पड़े हैं, सूने करघे, कौन बुने
जितने धागे टूट गए हैं,उतने धागे कौन बुने

जिस्मों पर पौशाक हो लेकिन आँखें नंगी बेहतर हैं
जिनको रोज उधड़ना ठहरा, ऐसे सपने कौन बुने

पहला धागा ठीक पड़ा था, आगे आए झोल-ही-झोल
कौन उधेड़े दुनिया तुझको, नए सिरे से कौन बुने

कुनबे वाले अच्छे हैं, पर खोट जो है सो हममें है
अपने आपको धोखा देकर झूठे सपने कौन बुने

नर्म मुलायम ज़ानू* जैसे लगते थे सर रखते ही
रंग-बिरंगे रेशम से अब वैसे तकिए कौन बुने

जाने वाले छोड़ गए उलझाव हमारे हिस्से का
कौन निकाले अपनी राहें, अगले रस्ते कौन बुने

1-बरहना--नग्न
2-ज़ानू--गोद

सोमवार, 1 अगस्त 2011

'मेरा जिस्म सूली पे लटका हुआ है'

(15)
मेरी प्यास शोलों से सींची गई है
मेरा प्यार पारे से ढाला गया है
मुझे जानने को सभी जानते हैं
मगर वो कहां है, जो पहचानता है

ये सच है, मुझे दूसरे जी रहे हैं
मगर ये सितम मुझपे तन्हा नहीं है
यहाँ हर कोई अपने ही रोज़ो-शब* में
किसी और की जिंदगी जी रहा है

अगर आज की रात तुम आ सको तो
तुम्हें मैं ये दिलचस्प मंज़र दिखाऊँ
कि मैं अपने बिस्तर पर तन्हा पड़ा हूँ
मेरा जिस्म सूली पे लटका हुआ है

मैं वो फूल हूँ अजनबी मौसमों का
जिसे चुन के ख़ुद सर चढ़ाया था तुमने
वो सूखा हुआ ख़ुश्क पत्ता नहीं हूँ
जो शाख़ों से दामन पे खुद आ गिरा है

मैं क्यों हूँ, अगर हूँ.. तो क्यों जी रहा हूँ?
मुझे किसलिए ये सज़ा दी गई है
ख़ुदा जाने ये कनखजूरा-सा क्या है,
जो हरदम मेरे ज़हन में रेंगता है।

1-रोज़ो-शब--दिन-रात

'सब गवाह हुए कातिलों के साथ'

(14)
रिश्ता ही मेरा क्या है अब इन रास्तों के साथ
उसको विदा कर तो दिया आँसुओं के साथ

अब फ़िक्र है कि कैसे यह दरिया उबूर* हो
कल किश्तियाँ बँधी थीं इन्हीं साहिलों के साथ

अब फ़र्श हैं हमारे, छतें दूसरों की हैं
ऐसा अज़ाब पहले कहाँ था घरों के साथ

कैसा लिहाज़-पास, कहां की मुरव्वतें
जीना बहुत कठिन है,अब इन आदतों के साथ

बिस्तर हैं पास-पास मगर क़ुबर्ते* नहीं
हम घर में रह रहे हैं, अज़ब फ़ासलों के साथ

मैयत* को उठाके ठिकाने लगाइए
मौक़े के सब गवाह हुए कातिलों के साथ

1- उबूर*--तप
2- क़ुबर्ते*--निकटता
3-मैयत*---मृतक