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सोमवार, 1 अगस्त 2011

'मेरा जिस्म सूली पे लटका हुआ है'

(15)
मेरी प्यास शोलों से सींची गई है
मेरा प्यार पारे से ढाला गया है
मुझे जानने को सभी जानते हैं
मगर वो कहां है, जो पहचानता है

ये सच है, मुझे दूसरे जी रहे हैं
मगर ये सितम मुझपे तन्हा नहीं है
यहाँ हर कोई अपने ही रोज़ो-शब* में
किसी और की जिंदगी जी रहा है

अगर आज की रात तुम आ सको तो
तुम्हें मैं ये दिलचस्प मंज़र दिखाऊँ
कि मैं अपने बिस्तर पर तन्हा पड़ा हूँ
मेरा जिस्म सूली पे लटका हुआ है

मैं वो फूल हूँ अजनबी मौसमों का
जिसे चुन के ख़ुद सर चढ़ाया था तुमने
वो सूखा हुआ ख़ुश्क पत्ता नहीं हूँ
जो शाख़ों से दामन पे खुद आ गिरा है

मैं क्यों हूँ, अगर हूँ.. तो क्यों जी रहा हूँ?
मुझे किसलिए ये सज़ा दी गई है
ख़ुदा जाने ये कनखजूरा-सा क्या है,
जो हरदम मेरे ज़हन में रेंगता है।

1-रोज़ो-शब--दिन-रात

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