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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

'कोई शख़्स भी ऐसा न था'

(2)
दर्द की टीसें न थीं, आँसू न थे, नाला* न था
हमने शायद तुझको अगलों की तरह चाहा ना था
 
कितना मुश्किल है समझना और समझाना इसे
अब से पहले का ज़माना इतना पेचीदा न था
 
दम-बखुद* थे लोग अपने आपसे सहमे हुए
घर के अंदर आफ़ियत* का एक भी गोशा न था
 
बंद दरवाज़ों से अपना सर पटकती थी हवा
तंग गलियों से निकलने का कोई रस्ता न था
 
हम समझते थे  कि है यह भी मताए-दीगराँ*
जिंदगी को हमने अपना जानकर बरता न था
 
गिर गया बर्गे-ख़िज़ाँ-आसार* तुझसे टूटकर
शाख़े-लरज़ाँ!* इसमें क्या तेरा कोई मंशा न था
 
जो समझ सकता पसे-अलफ़ाज़* मानी का तिलिस्म
इस भरी बस्ती में कोई शख़्स भी ऐसा न था।
 
*नाला-फरियाद
 दम बखुद-मौन
 आफ़ियत-शांति
 मताए -दीगराँ-पराया धन
 बर्गे-ख़िज़ाँ-आसार-पतझड़ का पत्ता
 शाख़े-लरज़ाँ-काँपती हुई डाली
 पसे-अलफ़ाज़-शब्दों की पृष्ठभूमि
 

सोमवार, 11 जुलाई 2011

'तुम्हारा अपना'

आपने चढ़ती-ढ़लती धूप में दीवार की छाया को रुख़,आकार और दिशाएं बदलते देखा होगा आपने देखा होगा कि धूप का उतार-चढ़ाव किस प्रकार दीवार की छाया को परिवर्तित होने पर विवश कर देता है। लेकिन निश्तर ख़ानक़ाही के यहां धूप-छांव का यह खेल जीवन की वास्तविकताओं को उजागर करने वाले दर्पण की भांति सामने आता है। वे जिन्दगी की धूप-छांव के पारखी ही नहीं, उसे कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने वाले सहित्यकार भी थे।
 
(1) जाँ भी अपनी नहीं, दिल भी नहीं तन्हा अपना
     कौन कहता है कि दुख-दर्द हैं अपना-अपना
 
     दुश्मन-ए-जाँ ही सही, कोई शनासा* तो मिले
     बस्ती-बस्ती लिए फिरता हूं सराया अपना
 
     पुरसिशे-हाल* से ग़म और न बढ़ जाए कहीं
     हमने इस डर से कभी हाल न पूछा अपना
 
     ग़ैर फिर ग़ैर है क्यों आए हमारे-नजदीक
     हम तो खुद दूर से करते हैं तमाशा अपना
 
    लड़खड़ाया हूं, जो पहले तो पुकारा है तुम्हें
    अब तो गिरता हूं तो लेता हूं सहारा अपना
 
    अब न वो मैं हूं न वो तुम, न वो रिश्ता बाकी
    यूं तो कहने को वही मैं हूं 'तुम्हारा अपना'
   
   *शनासा-परिचित
   *पुरसिशे-हाल- हाल पूछना