Follow by Email

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

'बिखर जाऊँगा मैं'

(13)
फ़रामो शगारी की लीलाहटों में धुआं
बनके इक दिन बिखर जाऊँगा मैं
कोई धुंधला-धुध़ला-सा मंज़र हो जैसे,
अभी याद हूँ कल बिसर जाऊँगा मैं

मेरे सच की सारी हक़ीक़त यही है
कि सच्चाई के झूठ का रूप हूँ मैं
अगर सबका सच ही बनना पड़ा तो
अँधेरे में हर-सू बिखर जाऊँगा मैं,

मुझे सब्ज़ो-शादाब चावल के रेज़े*
अभी और चुनने दो इन घाटियों में
मैं आबी परिंदा हूँ जाड़ों की रात का
ये मौसम जो गुज़रा, गुज़र जाऊँगा मैं

तुम्हीं अब कोई ऐसी तकदीर सोचो
कि राइज-शुदा* जिंदगी जी सकूँ मैं
न सोची तो इन बेकराँ* बुसअतों* मैं,
अकेला-अकेला ही मर जाऊँगा मैं

मैं संगे-सरे-राह* हरगिज़ नहीं हूँ
मुझे इस तरह ठोकरों से न रौंदो
मैं पत्थर पहाड़ों की ढलवान का हूँ
अभी हूँ, अभी कूच कर जाऊँगा मैं

मैं चारों दिशाओं को मुट्ठी में थामें,
तहे-आस्माँ बे-सहारा खड़ा हूँ
कोई रास्तों का तैयुन* नहीं है
किसी को ख़बर क्या कि घट जाऊँगा मैं

1-भूल
2-हरे-भरे
3- रेज़े*--टुकड़े
4- राइज-शुदा--प्रचलित
5-बेकराँ--असीम
6- बुसअतों--फैलाव
7- संगे-सरे-राह--रास्ते का पत्थर
8- तैयुन--निर्धारण

'मैं अपने कानों में गूँजता हूँ'

(12)
मैं गहरे-गहरे समुंदरों की सियाहियों से लिखा गया हूँ
हमा-जहत जिदंगी का लेकिन में एक छोटा सा वाक्या हूँ

हरेक शय मर चुकी है मुझमें कि औऱ भी कुछ रहा है बाक़ी
तमाम दिन की हलाकतों से जो बचके निकला तो सोचता हूँ

अगरचे सूरज की सरज़मीं पर कहीं-कहीं छांव भी बहुत है
मगर जो पैदा नहीं हुए हैं, मैं उन दरख़्तों को ढूँढ़ता हूँ

मैं कोई ऐसा नगर नहीं हूँ, गिने चुने रास्ते हो जिसके
जिधर से चाहो उधर से गुज़रों, मैं रेगज़ारों का सिलसिला हूँ

जहाने-सौतो-सदा से आगे की मेरी दुनिया बसी हुई है
कभी तो मेरे क़रीब आओ, मैं अपने कानों में गूँजता हूँ

1-हमा-जहत--समस्त दिशाओं में मला हुआ
2-हलाकतों--मौत जैसी घटना
3-जहाने-सौतो-सदा-- स्वर-संसार

बुधवार, 27 जुलाई 2011

'मेरे दामन में क्या रहा'

 (11)
अनजाने हादिसात का खटका लगा रहा
नींद आ रही थी रात मगर जागता रहा

वो सिरफिरी हवा थी आई गुज़र गई
इक फूल था, जो दिल की तरह कांपता रहा

मैं क्या था, शाखे-जर्द का इक बर्गे-खुश्क था
निकला जो आँधियों से तो शोलों में जा रहा

मेरा ही रूप था जो पसे-पर्दा-ए-वजूद*
नफ़रत से सारी उम्र मुझे देखता रहा

तेज आँधियों में गर्दे-सफ़र तक न बच सकी
मत पूछ, मुझसे अब मेरे दामन में क्या रहा

पानी के आर-पार निगाहें न जा सकीं
दरिया इश्क और भी तहे-दरिया छुपा रहा

1-अस्तित्व के आवरण तले

'मेरी जिन्दगी के रात-दिन'

(10)
तेज़-रौ पानी की तीखी धार पर बहते हुए
कौन जाने कब मिलें इस बार के बिछुड़े हुए

अपने जिस्मों को भी शायद खो चुका है आदमी
रास्तों में फिर रहे है पैरहन बिखरे हुए

अब यह आलम है कि मेरी जिन्दगी के रात-दिन
सुबह मिलते हैं मुझे अख़बार में लिपटे हुए

अनगिनत जिस्मों का बहरे-बेकराँ है और मैं
मुद्दतें गुज़री हैं अपने आपको देखे हुए

किन रुतों की आरज़ू शादाब रखती है इन्हें
यह खिज़ाँ की शाम और जख़्मों के वन महके हुए

काट में बिजली से तीखी, बाल से बारीक़तर
जिन्दगी गुजरी है उस तलवार पर चलते हुए

1-पैरहन--वस्त्र
2-बहरे बेकराँ--असीम सागर

'आग की लपटों में था मकान मेरा'

(9)
न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा
तमाम रात भटकता रहा गुमान मेरा

मैं घर बसा के समुंदर के बीच सोया था
उठा तो आग की लपटों में था मकान मेरा

जुनून न कहिए इसे, खुद-अज़ीयती* कहिए
बदन तमाम हुआ है लहू-लुहान मेरा

हवाएं गर्द की सूरत उड़ा रही हैं मुझे
न अब ज़मीं ही मेरी है, न आसमान मेरा

धमक कहीं हो, लरज़ती हैं खिड़कियां मेरी
घटा कहीं हो, टपकता है सायबाँ मेरा

मुसीबतों के भँवर में पुकारते हैं मुझे
अजीब दोस्त हैं, लेते हैं इम्तिहान मेरा

किसे ख़तूत लिखूं, हाले-दिल सुनाउँ किसे
न कोई हर्फ़-शनासा* न हमज़माब* मेरा

1- खुद-अज़ीयती--अपने आप को कष्ट देना
2- हर्फ़-शनासा--अक्षर ज्ञाता
3- हमज़माब--सहभाषी

'बैठ के पहरों सोचोगे'

(8)
कल भी किसको देखा था, यह वो तो नहीं हैं, पूछोगे
हमसे मिलकर फिर जो मिलोगे, बैठ के पहरों सोचोगे

उम्र-रसीदां* नन्हें बच्चों! अब तो घरों को लौट चलो
गहरे साकित पानी में तुम कब तक पत्थर फेंकोगे

पास है जो कुछ भेंट चढ़ा दो मन की आग न बुझने दो
अगले बरस जब बर्फ़ गिरेगी, बैठे राख कुरेदोगे

रात हुई, पर मन की हलचल यारों! अब भी शांत नहीं
बाजारों की शोर मचाती भीड़ में कब तक घूमोगे

गर्दे-गुमाँ में ढल जाओगे, आखिर वो दिन आएगा
रात में जब भी आँख खुलेगी अपना जिस्म टटोलोगे
1-उम्र-रसीदाँ--वृद्धावस्था

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

'जीए जाते थे लोग'

(7)
आप-अपनी ज़ांत के शोलों में जल जाते थे लोग
क्या अंधेरा था कि जिससे रोशनी पाते थे लोग
      
ग़ुफ़्तगू में ढ़ूँढ़ते थे, कान ज़ज़्बों का सुराग
और जो कुछ दिल में आता था, सो कह जाते थे लोग

रूप का मंदिर भी देखा, हर दरीचा बंद था
नीम-उर्या* जिस्म दीवारों पे लटकाते थे लोग

तूने ए पतझड़ के मौसम! वो समाँ देखा नहीं
घर को जब क़ागज के गुल-बूरे लिए जाते थे लोग

ख़ुदफ़रेबी* का धुँधलका की ग़नीमत था कि जब
दिल को बे-बुनियाद उम्मीदों से बहलाते थे लोग

और बढ़ जाती थी बाज़ारों की रौनक़ दिन ढले
घर के सन्नाटे से घबराकर निकल आते थे लोग

काश! इक पल अपनी मर्ज़ी से भी जीकर देखते
जाने किस-किस के इशारों पर जीए जाते थे लोग

1- नीम-उर्या- अर्द्ध नग्न
2- ख़ुदफ़रेबी- खुद को भ्रमित रखना

'प्यार का मौसम गुज़र गया'

(6)
धड़का था दिल कि प्यार का मौसम गुज़र गया
हम डूबने चले थे कि दरिया उतर गया

ख़्वाबों की मताए-गिराँ* किसने छीन ली
क्या जानिए वो नींद का आलम किधर गया

तुमसे भी जब निशात* का इक पल न मिल सका
मैं कासा-ए-सवाल* लिए दर-बदर गया

भूले से कल जो आइना देखा तो ज़हन में
इक युनहदिम* मकान का नक़्शा उभर गया

तेज़ आँधियों में पाँव ज़मीं पर न टिक सके
आख़िर को मैं गुबार की सूरत बिखर गया

गहरा सकूत, रात की तनहाइयां, खंडहर
ऐसे में अपने आपको देखा तो डर गया

कहता किसी से क्या कि कहां घूमता फिरा
सब लोग सो गए तो मैं चुपके से घर गया

1-मताए- गिराँ-बहूमुल्य पूंजी
2-निशात- सुख
3-कासा-ए-सवाल- भिक्षा का प्याला
4-युनहदिम- खंडहर

'प्यार का दिन डूबने लगा'

(5)
दिल तेरे इंतज़ार में कल रात भर जला
नर्गिस का फूल पिछले पहर तक खिला रहा

पहले तो अपने आपसे बेज़ारियां* बढ़ी
फिर यों हुआ कि तुझसे भी दिल ऊबने लगा

अच्छा हुआ कि सारे खिलौने बिखर गए
गुंचे, सुबू*, शराब, शफ़क़, चांदनी, सबा

सहरा की वुसअतों* में न जब आफ़ियत मिली
मैं शहर-शहर दिल का सुकूँ ढ़ूँढ़ता फिरा

जागा हुआ था नींद की मदहोशियों में हुस्न
देखा सकूते-शब* में बदन बोलता हुआ

पहले भी किसने प्यार के वादे वफ़ा किए
पहले भी कोई प्यार में सच बोलता न था

दफ़्तर से थक के लौट रहा था कि घर के पास
पहुँचा तो तेरे प्यार का दिन डूबने लगा

1-बेजारियाँ- उकताहट
2-सुबू- मदिरा-पात्र
3-सबा- समीर
4-वुसअतों- फैलाव
5-सकूते-शब- रात का सन्नाटा

सोमवार, 25 जुलाई 2011

'ढूँढे से भी घर न निकले'

(4)
तग़ाफुल* के बेरूह पैकर* न निकले
जिन्हें हमने चाहा वो पत्थर ना निकले
 
जो निकले तो कब? जब खुशी थी,न ग़म था
वो आँसू जो ग़म में भी अक्सर न निकले
 
जिन्हें कह के एक बार चुप लग गई थी
वो क़िस्से ज़बाँ से मुकर्रर* न निकले
 
भटकते फिरे हम तो कूचा-ब-कूचा
तुम्हारे ही दामन में पत्थर न निकले
 
वो पैकर जिन्हें हमने पूजा है बरसों
कभी अपने जिस्मों से बाहर न निकले
 
बयाबां में रौनक थी, वहशत घरों में
कभी हम तो ढूँढे से भी घर न निकले
 
1.तग़ाफुल--उदासीनता
2.पैकर---आकार
3.मुकरर्र--दोबारा

रविवार, 24 जुलाई 2011

'गुम हूँ मैं'

(3)
हर गाम* पे यह सोच के, मैं हूं कि नहीं हूं
क्या कहर है खुद अपनी ही परछाई को देखूँ
 
इस अहद में सानी मेरा मुश्किल से मिलेगा
मैं अपने ही जख्मों का लहू पी के पला हूँ
 
ऐ! चर्ख़े-चहरूम के मकी*! देख कि मैं भी
तेरी ही तरह सच की सलीबों पे टंगा हूं
 
मोहलिक* है तेरा दर्द भी क़ातिल है अना* भी
हैरान हूं इल्ज़ाम अगर दूँ तो किसे दूँ
 
कल तक तो फ़क़त तरे तकल्लुम* पे फिदा था
अब अपनी ही आवाज की पहचान में गुम हूँ
 
गाम-हर कदम
चर्ख़े-चहरूम के मकी-ईसा मसीह
मोहलिक- घातक
अना-स्वाभिमान
तकल्लुम-वार्तालाप