Follow by Email

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

'रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त'

(57)
रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त
आख़िर लिखना भूल गई, वो हर दिन लिखने वाली ख़त

इल्म* नहीं है शायद उसको मैं हूँ एहद् सवालों का
आनेवाली रूत ने भेजा मेरे नाम जवाबी ख़त

हाथ से मेरे छूट गई तब, क़ौसे-कुज़ह की धारी इक
वापस जाते वक़्त का मंज़र उसकी पुश्त का वस्ती* ख़त

अव्वल-अव्वल पुर रहते थे लाख निजी तफ़सीलों से
रफ़्ता-रफ़्ता खो बैठे फिर अगली जैसे दराज़ी ख़त

पढ़ते-पढ़ते पी जाती थीं, आँखें ख़त के लफ्ज़ों को
आज जो देखा चाट रहे थे अपनी आप सियाही ख़त

उसके मेरी क़ौले-क़सम* पर देख गवाही देते हैं
राख में आतिश-दानों की अंजाम-रसीदा* दस्ती* ख़त

1- इल्म*--ज्ञान
2- वस्ती* --इंद्र धनुष
3- दरमियानी
4-विस्तार
5-परिणाम को पहुँचे हुए
6-पत्रवाहक द्वारा भेजे गए

सोमवार, 19 सितंबर 2011

'कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह'

(56)
कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह
अजीब बादल का सायबाँ-सा मुझे मिला वह
      
वो जिसकी संगत में मैंने समझे समय के मानी
पलट के इक उम्र-रायगाँ* सा मुझे मिला वह

वो मुझ मुसाफ़िर की क्या तवाज़ो* ग़रीब करता
ख़ुद अपने घर ही में मेहमाँ सा मुझे मिला वह

तमाज़तें* गर्मियों के दिन की करीब-तर थीं
निकलते जाड़ों के आस्माँ-सा मुझे मिला वह

मैं छोड़ आया था सब्त* जिस पर शिनाख़्त अपनी
महावटों में धुले मकाँ-सा मुझे मिला वह

मैं कैसे उसको गए दिनों का हिसाब दूँगा
जो अब मुजस्सम ग़मे-जियाँ-सा* मुझे मिला वह

1- उम्र-रायगाँ*--व्यर्थ जाने वाली उम्र
2- तवाज़ो*--आदर-सत्कार
3- तमाज़तें* --तपन
4- सब्त* अंकित
5- ग़मे-जियाँ-सा*--हानि का साकार रूप