बुधवार, 21 मार्च 2012

'घर के रोशनदानों में अब काले पर्दे लटका दे'

(95)

घर के रोशनदानों में अब काले पर्दे लटका दे
रातों के मटियालेपन को थोड़ा और अँधेरा दे

दिन में सपने देखने वाले रस्ता-रस्ता बिखरे हैं
प्यासे दिल को दे न तमन्ना, दे तो साथ वसीला दे

शहर से जब भी लौट के आऊँ, देखूँ, सोचूँ, हैरत हो
सीधा-सादा बरगद अब भी धूप सहे और साया दे

लौटा तो अख़बार पुराना, बोला मेरी तलावत* कर
कमरे की दीवार का धब्बा, चीख़ा मुझको चेहरा दे

शहर की छीना-झपटी में सब अपने लोग मुक़ाबिल हैं
आलम अफ़रा-तफ़री का है, कौन किसी को मौक़ा दे

अक़्लो-हुनर* का मोल नहीं है, बस्ती में बंजारों की
मुझसे मेरी दानिश ले ले, लेकिन मौला पैसा दे

1- तलावत--अध्ययन
2- अक़्लो-हुनर--बुद्धि


मंगलवार, 20 मार्च 2012

'चुन रहा हूँ, सुबह को अँगनाई में बैठा हुआ'

(94)

चुन रहा हूँ, सुबह को अँगनाई में बैठा हुआ
दाना-दाना रात के खलिहान का बिखरा हुआ

आ, कि अब इस खोखलेपन पर हँसें बेसाख़्ता
तेरे आँसू तयशुदा थे, मेरा ग़म सोचा हुआ

उससे क्या कहता कि मेरी रूह छलनी हो गई
दोस्त था, इज़हारे-हमदर्दी से आसूदा हुआ

हादिसा ये घर के जलने से भी था संगीन-तर
उसके होठों पर मिला इक क़हक़हा चिपका हुआ

अब की बरखा में ये टूटी छतरियाँ काफ़ी नहीं
आँधियाँ उठने को हैं, बादल बहुत गहरा हुआ

1- इज़हारे-हमदर्दी--साहनुभूति की अभिव्यक्ति
2- आसूदा--संतुष्ट प्रसन्न 

'अपने होने का हम एहसास दिलाने आए'


(93)
अपने होने का हम एहसास दिलाने आए
घर में इक शमआ पसे-शाम जलाने आए

हाल घर का न कोई पूछने वाला आया
दोस्त आए भी तो मौसम की सुनाने आए

नाम तेरा कभी भूलूँ, कभी चेहरा भूलूँ
कैसे दिलचस्प मेरी जान ज़माने आए

ग़म के एहसास से जब भीग चली थीं आँखें
ठीक उस पल मुझे कुछ ज़ख़्म हँसाने आए

यों लगा जैसे कलाई की घड़ी है तू भी
हम जो कुछ वक़्त तेरे साथ गँवाने आए

हम से बेफ़ैज फ़क़ीरों की है परवा किसको
रूठ जाएँ तो हमें कौन मनाने आए

सोमवार, 19 मार्च 2012

'भरोसा उसे मेरी यारी का है'

(92)
भरोसा उसे मेरी यारी का है
हुनर मुझमें मतलब-बरारी का है

मेरे दिल को दुनिया से नफ़रत न थी
नतीजा तेरी ग़म-गुसारी का है

मैं अज़-ख़ुद* बिखरना न चाहूँ मगर
अजब वक़्त ख़ुद-इंतशारी* का है

बहाने का रंजिश के जोया है वह
यह मौक़ा अजब होशियारी का है

तख़ातुब* में इज़्ज़त भी, अलक़ाब भी
ये सब सिलसिला नागवारी* का है

गिराँ मुझपे है होशमंदी तेरी
तुझे दुख मेरी मयगुसारी का है

1- अज़-ख़ुद--अपने आप
2- ख़ुद-इंतशारी--स्वयं का बिखराव
3- तख़ातुब--संबोधन
4- अलक़ाब--सम्मानसूचक शब्द
5- नागवारी--अप्रसन्नता

रविवार, 18 मार्च 2012

मेरे लहू की आग: 'जागती आँखें देख के मेरी वापस सपना चला गया'

मेरे लहू की आग: 'जागती आँखें देख के मेरी वापस सपना चला गया': (91) जागती आँखें देख के मेरी वापस सपना चला गया रेत नहाने वाले पंछी सावन सूखा चला गया भीगी घास पे गुमसुम बैठा सोच रहा हूँ शाम-ढले जेठ क...

'जागती आँखें देख के मेरी वापस सपना चला गया'


(91)
जागती आँखें देख के मेरी वापस सपना चला गया
रेत नहाने वाले पंछी सावन सूखा चला गया

भीगी घास पे गुमसुम बैठा सोच रहा हूँ शाम-ढले
जेठ की तपती गर्म हवा-सा जीवन गुज़रा, चला गया

मेरे भेस में उसने पाया मेरे जैसा और कोई
वो मुझसे मिलने आया था, तनहा-तनहा चला गया

ख़ौफ-ज़दा थे लोग, न निकले देखने करतब साँपों का
आज सपेरा बस्ती-बस्ती बीन बजाता चला गया

होना और न होना मेरा दोनों ही मशकूक* हुए
उसके रहते अपने ऊपर था जो भरोसा चला गया

कैसे उसको छत पर अपनी रोक के रखना मुमकिन था
वो इक टुकड़ा बादल का था, आया, बरसा, चला गया

1-मशकूक--संदिग्ध

मेरे लहू की आग: 'फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भ...

मेरे लहू की आग: 'फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भ...: (90) फ़िक्रे-सुख़न* में रातें काँटीं, ख़ून जलाया दिन-दिन भर शब को उड़ा जो छत से कबूतर,हाथ ना आया दिन-दिन भर शाम हुई तो देखा अक्सर नक़्श...

'फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भर'

(90)

फ़िक्रे-सुख़न* में रातें काँटीं, ख़ून जलाया दिन-दिन भर
शब को उड़ा जो छत से कबूतर,हाथ ना आया दिन-दिन भर

शाम हुई तो देखा अक्सर नक़्शा अपनी तबाही का
ख़िश्ते-ख़याली* लेकर हमने महल बनाया दिन-दिन भर

बैठके घर में अच्छे दिनों के ख़्वाब दिखाए बच्चों को
फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भर

सर पर उठाकर इसको रख लें ऐसा कोई करिश्मा हो
किस हसरत से हमने देखा अपना साया दिन-दिन भर

कैसा क़ातिल मौसम आया जिसके साथ बिताई उम्र
लाख सई* की,नाम भी उसका याद ना आया दिन-दिन भर

खेत में आकर जब भी देखा, सारे पौधे प्यासे थे
रातों-रातों बरखा बरसी बादल छाया दिन-दिन भर

1-फ़ि़क़्रे-सुख़न--काव्य रचना के ध्यान में
2-ख़िश्ते-ख़याली--ख़याली ईंटें
3-सई- प्रयास

'किन परबतों पे तेशा* उठाए हुए हैं हम'

किन परबतों पे तेशा* उठाए हुए हैं हम
अपने लहू में आप नहाए हुए हैं हम

हर जिस्म इक मकान की मानंद है जहाँ
शिकमी-किराएदार* बसाए हुए हैं हम

चालाक हो गए है परिंदे मुँडेर के
जेबों में पत्थरों को छुपाए हुए हैं हम

करना पड़ा जो सामना अपना कभी तो फिर
अब तक तो ख़ुद को ख़ुद से छुपाए हुए हैं हम

है यों कि दस्तख़त हैं तमस्सुक* पे कर्ज़ के
हरचंद सब हिसाब चुकाए हुए हैं हम

1-तेशा- हथौड़ा
2-शिकमी-किराएदार-अवैध रूप से किराएदार द्वारा किरए पर दिया गया मकान
3-तमस्सुक-ऋण पत्र, रुक़्का