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मंगलवार, 20 मार्च 2012

'अपने होने का हम एहसास दिलाने आए'


(93)
अपने होने का हम एहसास दिलाने आए
घर में इक शमआ पसे-शाम जलाने आए

हाल घर का न कोई पूछने वाला आया
दोस्त आए भी तो मौसम की सुनाने आए

नाम तेरा कभी भूलूँ, कभी चेहरा भूलूँ
कैसे दिलचस्प मेरी जान ज़माने आए

ग़म के एहसास से जब भीग चली थीं आँखें
ठीक उस पल मुझे कुछ ज़ख़्म हँसाने आए

यों लगा जैसे कलाई की घड़ी है तू भी
हम जो कुछ वक़्त तेरे साथ गँवाने आए

हम से बेफ़ैज फ़क़ीरों की है परवा किसको
रूठ जाएँ तो हमें कौन मनाने आए

1 टिप्पणी:

  1. हम से बेफ़ैज फ़क़ीरों की है परवा किसको
    रूठ जाएँ तो हमें कौन मनाने आए

    subhanallah.

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