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रविवार, 18 मार्च 2012

'फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भर'

(90)

फ़िक्रे-सुख़न* में रातें काँटीं, ख़ून जलाया दिन-दिन भर
शब को उड़ा जो छत से कबूतर,हाथ ना आया दिन-दिन भर

शाम हुई तो देखा अक्सर नक़्शा अपनी तबाही का
ख़िश्ते-ख़याली* लेकर हमने महल बनाया दिन-दिन भर

बैठके घर में अच्छे दिनों के ख़्वाब दिखाए बच्चों को
फ़र्ज़ी सुख पर करके भरोसा खुद को हँसाया दिन-दिन भर

सर पर उठाकर इसको रख लें ऐसा कोई करिश्मा हो
किस हसरत से हमने देखा अपना साया दिन-दिन भर

कैसा क़ातिल मौसम आया जिसके साथ बिताई उम्र
लाख सई* की,नाम भी उसका याद ना आया दिन-दिन भर

खेत में आकर जब भी देखा, सारे पौधे प्यासे थे
रातों-रातों बरखा बरसी बादल छाया दिन-दिन भर

1-फ़ि़क़्रे-सुख़न--काव्य रचना के ध्यान में
2-ख़िश्ते-ख़याली--ख़याली ईंटें
3-सई- प्रयास

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर है ये ग़ज़ल भी........हो सके तो टिप्पणिओं में से word verification हटा दे ।

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