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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

'चाय की पियाली में, उसकें होंठ रक्खे थे'

(26)
रात एक पिक्चर में, शाम एक होटल में, बस यही बसीले थे
मेज़ के किनारे पर, चाय की पियाली में, उसकें होंठ रक्खे थे

मैने तुमको रक्खा था, बक्स में सदाओं के, तह-ब-तह हिफ़ाजत से
रात मेरे घर में तुम इक महीने फ़ीते पर गीत बनके उभरे थे

दस्तख़त नहीं बाक़ी, बस हरुफ़ टाइप के क़ाग़ज़ों में ज़िंदा हैं
याद भी नहीं आता, प्यार के ये ख़त जाने, किसने किसको लिक्खे थे

दर्द-खानादारी का, हमको क्या पता क्या है, हम जवान शहरों के
होटलों में रहते थे, हॉट-डाग खाते थे, काकटेल पीते थे

आज का भी दिन गुज़रा, डाकतार वालों की कल से कामबंदी है
जाने किन उमीदों पर हमने रात काटी थी, गिन के पल गुजारे थे।

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

'मेरे लहू की आग ही झुलसा गई मुझे'

(25)
मेरे लहू की आग ही झुलसा गई मुझे
देखा जो आइना तो हँसी आ गई मुझे

मेरी नमूद* क्या है, बस हक तूदा-ए-सियाह*
कौंदी कभी जो बर्क़* तो चमका गई मुझे

मैं दश्ते-आरजू पे घटा बनके छा गया
गर्मी तेरी वजूद की बरसा गई मुझे

मैं जैसे इक सबक़ था कभी का पढ़ा हुआ
उठी जो वो निगाह तो दोहरा गई मुझे

हर सुबह मैंने ख़ुद को ब-मुश्किल बहम किया*
उतरी ज़मीं पे रात तो बिखरा गई मुझे

तेरी नज़र भी दे न सकी ज़िंदगी का फ़न
मरने का खेल सहल* था, सिखला गई मुझे

1- नमूद*--प्रदर्शन
2- तूदा--सियाह*--काला ढेर
3- बर्क़*--बिजली
4- ब-मुश्किल बहम किया--कठिनाई से इकट्ठा किया हुआ
5- सहल*--आसान

बुधवार, 10 अगस्त 2011

'मेरी पलकों पे ठहरी हुई धूप है'

(24)
ये जो फैली हुई है दरो-बाम* पर
जिसको कहते हैं सब चाँदनी, धूप है
घर से बाहर निकलकर तो देखो ज़रा
ये ख़ुनक* रोशनी रात की धूप है

अपने कमरे के दरवाज़े मूँदे हुए
दिन को बिस्तर में तारे उगाता हूँ मैं
सिमटी-सिमटी सी, नादिम सी, ख़ामोश सी
मेरे आँगन में बैठी हुई धूप है

सर-बुरीदा*, घनी घास के दरमियाँ
वो वादी है, उसमें उतरते हुए
सर उभारा तो देखा वही हिद्दते*
वो ही लू के थपेड़ें, वही धूप है

तुम उन्हीं वादियों में डुबो दो मुझे
डूब जाता है झुलसा हुआ दिन जहाँ
मेरी आँखों में सूरज है दहका हुआ
मेरी पलकों पे ठहरी हुई धूप है

आस्माँ!  तेरी बाहों से लिपटा हुआ
कोई आवारा बादल का टुकड़ा भी है
अब तो पत्ते का भी सर पे साया नहीं
जिस तरफ भी चलो, धूप ही धूप है

अब वो मौसम कहाँ है, वो झीलें कहाँ
मैं जो पूछूँ भी तो क्या बताए कोई
पर सुखाते थे आबी परिंदे जहाँ
क्या ये बस्ती वही है, वही धूप है

मैं कि जाड़ों की रातों का ठिठुरा हुआ
तेरे नज़दीक आया हूँ ऐ जिंदगी
इक किरन मेरी झोली में भी डाल दे
तेरी मुट्ठी में तो सुबह की धूप है।

1- दरो-बाम- छत, दरवाज़े
2-ख़ुनक*- शीतल
3-सर-बुरीदा- छिली कटी हुई
4-हिद्दते- जल पक्षी

'मेरे बाद न झूला बादल'

(23)
छा गया सर पे मेरे गर्द का धुँधला बादल
अबके सावन भी गया, मुझ पे न बरसा बादल

दीप बुझते हुए सूरज की तरफ देखते हैं
कैसी बरसात है मेरी जान! कहाँ का बादल

वो भी दिन थे कि टपकता था छतों से पहरों
अब के पल-भर भी मुँडेरों पे न ठहरा बादल

फ़र्श पर गिर के बिखरता रहा पारे की तरह
सब्ज़बाग़ो कि मेरे बाद न झूला बादल

लाख चाहा न मिली प्यार की प्यासी आग़ोश
घर की दीवार से सर फोड़ के रोया बादल

आज की शब भी जहन्नम में सुलगते ही कटी आज
की शब भी तो बोतल से न छलका बादल।

रविवार, 7 अगस्त 2011

'मेरा रिश्ता किसी मकान से था'

(22)
न कुछ ज़मीं से ताल्लुक, न आसमान से था
मेरे फ़रार का मतलब, फ़क़त उड़ान से था

कभी जो लौट भी आया तो किसके पूछूँगा
यहीं-कहीं मेरा रिश्ता किसी मकान से था

न जाने कौन-सी गुमनाम बस्तियों में गिरा
वो एक तीर जो निकला हुआ कमान से था

पसे-ज़बान भी कुछ है, ये सोचता कैसे
मेरे यक़ीं को ताअल्लुक तेरी ज़बान से था

न जाने कैसे उड़ा ले गई उसे भी हवा
वो इक बरक़ जो मुहब्बत की दास्तान से था

1-भाषा की तह में

'सुबह का सूरज उतरा नहीं'

(21)
ये भयानक रूप तो पहले कभी देखा नहीं
अब के तो पतझड़ में पेड़ों पर कोई पत्ता नहीं

वो कि अब जा भी चुका है मुझसे नाता तोड़कर
सोचता हूँ, मैंने उसका नाम तक पूछा नहीं

शहर के इक घर में इक नादान बच्चे को मुझे
छत से चिड़ियों को उड़ाने का समाँ भूला नहीं

रात के काले परिंदों, और कुछ पल सो रहो
सुबह का सूरज अभी दीवार पर उतरा नहीं

ऐसा लगता है कि आवाज़ की परछाई-सी
नक़्श है लेकिन मुझे वो नक़्श सा लगता नहीं

आज अपने आपसे मिलकर मैं ये सोचा किया
जैसा होना चाहिए था, आदमी वैसा नहीं

1- निशान

'तेरी-मेरी जीवन-कथा'

(20)
वो भी तो कुल जीवन न था, बस कुछ पलों का मोह था
आँखें मेरी जज़्बों भरी, चेहरा तेरा बोसों भरा

वो जब मिली सोचा यही, उसका मेरा रिश्ता है क्या?
इस ख़त पे है लिखा हुआ नाम और पता इक और का

बादल-भरा मौसम हूँ मैं, सूरज कभी, साया कभी
इक पल इधर कुछ और हूँ, इक पल उधर कुछ और था

ऐसी कोई साअत* भी है जो मुझको दे मानी मेरे
कहना कि मैं लफ़्ज़ हूँ, मफ़हूम* से बिछड़ा हुआ

मौज़ें बहा ले जाएंगी शब्दों की सारी किश्तियाँ
पानी पे है लिखी हुई, तेरी-मेरी जीवन-कथा

वो कौन था, क्या था भला, इससे मुझे क्या बहस है
कल तक वो मेरे साथ था, जैसा भी था अच्छा-बुरा

जीवन-मरण का योग था, उसका मेरा, होगा कभी
अब ज़िंदगी मिलती है यूँ, पल-भर की जैसे दाश्ता

1- साअत* --समय
2- मफ़हूम*--अर्थ