Follow by Email

सोमवार, 19 सितंबर 2011

'कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह'

(56)
कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह
अजीब बादल का सायबाँ-सा मुझे मिला वह
      
वो जिसकी संगत में मैंने समझे समय के मानी
पलट के इक उम्र-रायगाँ* सा मुझे मिला वह

वो मुझ मुसाफ़िर की क्या तवाज़ो* ग़रीब करता
ख़ुद अपने घर ही में मेहमाँ सा मुझे मिला वह

तमाज़तें* गर्मियों के दिन की करीब-तर थीं
निकलते जाड़ों के आस्माँ-सा मुझे मिला वह

मैं छोड़ आया था सब्त* जिस पर शिनाख़्त अपनी
महावटों में धुले मकाँ-सा मुझे मिला वह

मैं कैसे उसको गए दिनों का हिसाब दूँगा
जो अब मुजस्सम ग़मे-जियाँ-सा* मुझे मिला वह

1- उम्र-रायगाँ*--व्यर्थ जाने वाली उम्र
2- तवाज़ो*--आदर-सत्कार
3- तमाज़तें* --तपन
4- सब्त* अंकित
5- ग़मे-जियाँ-सा*--हानि का साकार रूप

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें