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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

'कोई शख़्स भी ऐसा न था'

(2)
दर्द की टीसें न थीं, आँसू न थे, नाला* न था
हमने शायद तुझको अगलों की तरह चाहा ना था
 
कितना मुश्किल है समझना और समझाना इसे
अब से पहले का ज़माना इतना पेचीदा न था
 
दम-बखुद* थे लोग अपने आपसे सहमे हुए
घर के अंदर आफ़ियत* का एक भी गोशा न था
 
बंद दरवाज़ों से अपना सर पटकती थी हवा
तंग गलियों से निकलने का कोई रस्ता न था
 
हम समझते थे  कि है यह भी मताए-दीगराँ*
जिंदगी को हमने अपना जानकर बरता न था
 
गिर गया बर्गे-ख़िज़ाँ-आसार* तुझसे टूटकर
शाख़े-लरज़ाँ!* इसमें क्या तेरा कोई मंशा न था
 
जो समझ सकता पसे-अलफ़ाज़* मानी का तिलिस्म
इस भरी बस्ती में कोई शख़्स भी ऐसा न था।
 
*नाला-फरियाद
 दम बखुद-मौन
 आफ़ियत-शांति
 मताए -दीगराँ-पराया धन
 बर्गे-ख़िज़ाँ-आसार-पतझड़ का पत्ता
 शाख़े-लरज़ाँ-काँपती हुई डाली
 पसे-अलफ़ाज़-शब्दों की पृष्ठभूमि
 

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