Follow by Email

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

'नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके'

(69)
नदी के सय्याल* रास्ते से लहू में चुपचाप हल हुआ दिन
ग़रूब* के वक़्त आस्माँ के किनारे-ज़ेरी* में खूँ-शुदा* दिन

मथी हुई मिट्टियों के अंदर छुपी हुई है शबीह* मेरी
मैं एक से दूसरी तरफ़ के सफ़र में हूँ दरदियान का दिन

तुम्हें भी तन्हाइयों में अपनी शरीक करना कहाँ था मुमकिन
कि सर्द बिस्तर पे रात मेरे बदन-बरहना* पड़ा रहा दिन

नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके
घरों में काफ़ूर जैसी शामें, सफ़र में हलका सहाब-सा दिन

उदास कमरे में अपने तन्हा, बख़ील* लम्हों से लौ लगाते
इक और हमने गुज़ार दी शब, इक और हमने गँवा दिया दिन

1- सय्याल*--तरल
2- ग़रूब* --सूर्यास्त
3- किनारे-ज़ेरी*--निचले किनारे
4- खूँ-शुदा* --खून में परिवर्तित
5- शबीह*-- सूरत
6- बदन-बरहना* --नग्न
7- बख़ील*--कंजूस

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें