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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

'दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा'

(85)
बे-दिशाई के अंधेरे सिलसिले आने को हैं
अब के इस जंगल में बीहड़ रास्ते आने को हैं

बस्तियों में भाव ख़ेमों* के बहुत ऊँचे हुए
क्या कहीं से फिर मुहाजिर* क़ाफिले आने को हैं

जिनकी पैमाइश,न जिन पर वक़्त की कोई ग़िरफ़्त
है सफ़र ज़िंदा तो वे भी फ़ासले आने को हैं

दर्द बातिल* हो चुका, आँसू तअस्सुर* खो चुके
अब मेरे होठों पे वहशी क़हक़हे आने को हैं

दो घड़ी को सोने वाले, कल के सपने भूल जा
आगे-आगे और लंबे रतजगे आने को हैं
1-कैंप
2-शरणार्थी
3-झूठा
4-प्रभाव

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