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बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

'वो जो पल ख़ाली हुआ, मर कर बसर मेरा हुआ'

(74)
इस तरह हर मरहला* ना-मोतबर*मेरा हुआ
पाँव गोया दूसरों के थे, सफ़र मेरा हुआ

उसका सन्नाटा ग़ज़ब था, इसका हंगामा ग़ज़ब
दश्त कब मेरा हुआ था, कब नगर मेरा हुआ

यों लगा जैसे मैं आवाज़ों के इक जंगल में हूँ
जब कभी शहरे-ख़मोशाँ*से गुज़र मेरा हुआ

कुछ तो दो शहरे-हवस में दाद इस किरदार*की
कल जो था सफ़्फ़ाक दुश्मन, चारागर*मेरा हुआ

दोस्तों! औकात-बेकरारी को फुर्सत मत कहो
वो जो पल ख़ाली हुआ, मरकर बसर मेरा हुआ

1-मंज़िल के लिए कूच
2-अविश्वसनिय
3-कब्रिस्तान
4-चरित्र
5-उपचारक

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