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रविवार, 9 अक्तूबर 2011

'दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती'

(72)
शज़र* आँगन का जब सूरज से लरज़ा* होने लगता था
कोई साया मेरे घर का निगहबाँ* होने लगता था

दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती
अक़ीदों* के अंधेरे में चिरागाँ होने लगता था

पुराने पेड़ फिर ताज़ा फलों से लदने लगते थे
गए मौसम से दिल जब भी गुरेज़ाँ* होने लगता था

चुनौती देने लगती थी नई दुशवारियाँ मुझको
सफ़र जब ज़िंदगी का मुझ पे आसाँ होने लगता था

बताऊँ क्या कि कैसा बा-मुरव्वत शख़्स था वो भी
मुझे इलज़ाम देकर ख़ुद पशेमाँ* होने लगता था

1-शज़र*--वृक्ष
2-लरज़ा*--कंपित
3-निगहबाँ*--रक्षक
4-गुरेज़ाँ*--आस्थाओं
5-बा-मुरव्वत--उदासीन
6-पशेमाँ*--लज्जित

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