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बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

'रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था'

(77)
रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे, मगर ऐसा भी था

लौट आती थीं कई साबिक़* पतों की चिट्ठियाँ
घर बदल देते थे बाशिंदे, नगर ऐसा भी था

वो किसी का भी न था लेकिन था सबका मोतबर*
कोई क्या जाने कि उसमें इक हुनर ऐसा भी था

तोलता था इक को इक अशयाए-मशरफ़*  की तरह
दोस्ती थी और अंदाज़े-नज़र ऐसा भी था

पाँव आइंदा*  की जानिब, सर गुजिश्ता*  की तरफ़
यों भी चलते थे मुसाफिर, इक सफ़र ऐसा भी था

हर नई रूत में बदल जाती थी तख़्ती नाम की
जिसको हम अपना समझते कोई घर ऐसा भी था

1-पुराने
2-विश्वसनीय
3-उपयोग की वस्तुएं
4-भविष्य
5-अतीत

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