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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

'चाँद-तारों के बिखरने का सबब जानता है'

(43)
चाँद-तारों के बिखरने का सबब जानता है
दिल है सद्-रोख़्ना* मेरा, कोई यह कब जानता है

इश्क़ में भई तो जलाल अपना बचा कर रखा
वो मेरी खंदालबी*, मेरा ग़ज़ब* जानता है

दूर बैठा है तो क्या सारी ख़बर है उसको
वो मेरी सुबह, मेरा दिन, मेरी शब जानता है

दर्स* की चंद किताबें तो पढ़ी हैं उसने
मेरा फ़रजंद* बुजुर्गों का अदब जानता है

मै कि हूँ शाख़ से टूटा हुआ सूखा पत्ता
शहर में कौन मेरा नामो-नसब जानता है

1- सद्-रोख़्ना*--सौ सुराखों वाली छलनी
2- खंदालबी*--खुश मिजाजी
3- ग़ज़ब*--गुस्सा
4- दर्स* --पाठ्यक्रम
5- फ़रजंद*--पुत्र

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