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बुधवार, 24 अगस्त 2011

'झुलसते शहर में सूरज बिखर गया तो क्या'

(38)
झुलसते शहर में सूरज बिखर गया तो क्या
ख़ुशी का ज़हर रगों में उतर गया तो क्या

हवा, हवा है, न ठहरी कहीं, न ठहरेगी
मैं चलते-चलते जो इक पल ठहर गया तो क्या

वो इक नफ़स जिसे अपने से कर चुका हूँ अलग
अगर न गुज़रा तो क्या है, गुज़र गया तो क्या

जो तुम भी आए तो बच-बच के पाँव रक्खोगे
मैं गिरके शीशे की सूरत बिखर गया तो क्या

उठा के संग समुंदर में फेंकते हो मगर
ये ज़ख़्म पानी का, पानी से भर गया तो क्या

यहाँ तो रोज़ ही मुझ जैसे लोग मरते हैं
अब इस हुजूम में इक मैं भी मर गया तो क्या

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