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बुधवार, 24 अगस्त 2011

'वो इक ख़याल के गुंचे का फूल में ढलना'

(37)
न गफ़लतें कहीं ऐसी, न आगही ऐसी
कहाँ किसी ने गुज़ारी है ज़िंदगी ऐसी

किस आबो-ताब से चमका था लम्हा भर का कोई
तमाम रात मिली फिर न रोशनी ऐसी

कोई बताए कहाँ जाके दिल को बहलाएँ
उदासियों में कभी थी न बे-दिली ऐसी

हमें तो जो भी मिला है, शरीफ लगता था
ख़ुदा किसी को कभी दे न सादगी ऐसी

वो इक ख़याल के गुंचे का फूल में ढलना
कहाँ कली को मिली है शगुफ्तग़ी ऐसी

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