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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

"आख़िरी चेहरा समझकर ज़ह्न में रख लो मुझे"

(113)

कुश्तो-खूँ* है जिस्मों-जाँ* के दरमियाँ ऐसा न हो
मेरा अपना सर ही मेरे हाथ पर रक्खा न हो

ये भी मुमकिन है कि कज-बहसी* की आदत हो उसे
ये भी मुम्किन है वो मेरी बात ही समझा न हो

ख़ून की आँधी में सूरज डूबते देखा है रात
औऱ ख़्वाबों की तरह, यह ख़्वाब भी सच्चा न हो

कल का सूरज कौन से आलम में निकले क्या ख़बर
मैं जहाँ हूं, कल वहाँ बस धूल हो, दरिया न हो

मौसमों की धुंध में लिपटी हुई उम्रे-रवाँ*
सिर्फ इक लम्हा जिसे ढूँढ़ा तो हो, पाया न हो

आख़िरी चेहरा समझकर ज़ह्न में रख लो मुझे
क्या ख़बर फिर इस ज़मीं पर आदमी पैदा न हो।

1-कुश्तो-खूँ*--मार-काट
2- जिस्मों-जाँ*--शरीर और आत्मा
3-कज-बहसी*--अनुचित वाद-विवाद
4-उम्रे-रवाँ*--गुज़रती उम्र


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