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सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

'सुबह का सूरज उगा, फिर क्या हुआ मत पूछिए'



(107)

सुबह का सूरज उगा, फिर क्या हुआ मत पूछिए
ओस के क़तरों से सागर का पता मत पूछिए

बस सफ़र, पैहम* सफ़र, दायम,* मुसलसल बेक़याम*
चलते रहिए, चलते रहिए, फ़ासला मत पूछिए

ज़िंदगी का रूप यकसाँ*, तजरुबे सबके अलग
इस समर* का भूलकर भी ज़ायक़ा मत पूछिए

मान भी लीजे नमूना ख़स्ता-हाली* को मेरी
मुझसे अपने शहर की आबो-हवा मत पूछिए


क्या ख़बर है कौन किस अंदाज़, किस आलम में हो
दोस्तों से उनके मसकन* का पता मत पूछिए

1-निरंतर
2-सदैव
3-बिना रुके
4-समान,एक जैसा
5-फल
6-दुर्दशा
7-घर

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