Follow by Email

रविवार, 6 मई 2012

टूटकर भी आइना अक्स-आशना है जाने-मन

टूटकर भी आइना अक्स-आशना* है जाने-मन
इस तरह जीने का किसको हौसला है जाने-मन

कुछ-न-कुछ तो है तअल्लुक़ अब वो जुज़वन* ही सही
सबका सब तो कौन किसका हो सका है जाने-मन

ज़िंदगी भर कौन किसका साथ देता है यहाँ
एक लम्हे की वफ़ा भी तो वफ़ा है जाने-मन

लफ़्ज़ पर विश्वास करना भी है लाचारी मेरी
कौन किसके अंदरूँ* को जानता है जाने-मन

अब असर-अंदाज़* कोई सानेहा होता नहीं
अब कि दिल सीने में पत्थर हो चुका है जाने-मन

1-प्रतिबिंब से जुड़ा हुआ
2-आंशिक
3-भीतर, मनःस्थिति
4-असर करने वाला


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें