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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

'कहता है आज दिन में उजाला बहुत है यार'


(88)
कहता है आज दिन में उजाला बहुत है यार
शायद ये शख़्स रात में जागा बहुत है यार

गुज़रा अभी है जुज़्बे-चहराम* ही रात का
यानी अभी चिराग़ को जलना बहुत है यार

सर सब्ज़ मौसमों की अलामत* तो है कोई
शाख़े-शजर* पे एक भी पत्ता बहुत है यार

हर साले-नौ* पे उसको लिखूं नेक ख़्वाहिशे*
आशोबे-रोज़गार* में इतना बहुत है यार

आँगन की उसके धूल है, इज़्ज़त भी अक़्ल भी
है यों कि उसके हाथ में पैसा बहुत है यार

1- जुज़्बे-चहराम*--चौथा भाग
2- अलामत*--निशानी
3- शाख़े-शजर*--वृक्ष की टहनी
4- साले-नौ*--नववर्ष
5- नेक ख़्वाहिशे*--शुभकामनाएं
6- आशोबे-रोज़गार*--दुनिया के झमेले

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