शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

' हवाए-नग़मा* मेरे जह्न के अंदर तो आ'

(115)

ऐ हवाए-नग़मा* मेरे जह्न के अंदर तो आ
देखना है तुझको जलते शहर का मंज़र  तो आ

संगरेजों* की तरह बिखरी हुई है कहकशाँ
मेरे सीने से निकल, ऐ आस्माँ बाहर तो आ

ले न यों कम-फ़ुर्सती* से मुद्दआ*, बे-रग़बती*
अब अगर अक्सर नहीं आता न आ, कमतर तो आ

अब हवा के सामने सीना-सियर* यों ही न हो
दिल को अपने दे सके फ़ौलाद का पैकर तो आ

कुछ-न-कुछ बाक़ी तो होगा, खुदफ़रोशी* से बदन
बर्फ़ अब गिरने को है ऐ जाँ तहे-चादर* तो आ

1- ऐ हवाए-नग़मा*--गीत लाने वाली हवा
2- संगरेजों--पत्थर के टुकड़ों
3- कहकशाँ--आकाश गंगा
4- कम-फ़ुर्सती--व्यवस्तता
5-  मुद्दआ*-अर्थ
6-  बे-रग़बती*--अलगाव
7- सीना-सियर*--आमने-सामने
8- खुदफ़रोशी*--स्वयं को बेचना
9-तहे-चादर*--चादर के नीचे

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