मंगलवार, 27 सितंबर 2011

'जिंदगी! है किसी दीवार का साया तू भी'

(62)
दश्ते-इमरोज* में अक्से-शबे-रफ़्ता* तू भी
मैं भी गुज़रे हुए लम्हों का मुसन्ना* तू भी

दोनों एक झूठ का इज़हार है, तू भी, मैं भी
मैं भी सच्चा हूँ, बज़ाहिर नहीं झूठा तू भी

मुझको पत्थर की तरह छोड़ के पाताल में अब
जिंदगी! बन गई बहता हुआ दरिया तू भी

बीती यादें, न यहाँ टूटते रिश्तों की चुभन
गाँव को छोड़ के अब शहर में आ जा तू भी

ज़ाविया* धूप के हमराह बदलता है तेरा
जिंदगी! है किसी दीवार का साया तू भी

1- दश्ते-इमरोज--वर्तमान के वन में
2- अक्से-शबे-रफ़्ता--गुज़री हुई रात की परछाई
3- मुसन्ना*--प्रतिलिपि
4- ज़ाविया*--कोण

सोमवार, 26 सितंबर 2011

'हम लिए बैठे हैं गुज़रे हुए दिन की पहचान'


(61)
इश्क़ क्या शय हो? जमाने की हवा कैसी हो
किसको मालूम है, कल बज़ए-वफ़ा* कैसी हो

हम लिए बैठे हैं गुज़रे हुए दिन की पहचान
जाने कल भीड़ में उस बुत की क़बा* कैसी हो

लफ़्ज़ का किसको भरोसा कि ख़बर ये भी नहीं
कल मेरे लब से जो निकले वो नवा* कैसी हो

उम्र जब दे चुके गुज़रे हुए लम्हों को तलाक़
जाने उस वक़्त मेरे घर की फ़िजा कैसी हो

आज की शब के तअल्लुक से कर कल का क़यास*
सुबह तक उसकी रविश किसको पता कैसी हो

1- बज़ए-वफ़ा*--वफ़ा का ढ़ग
2- क़बा*---वस्त्र
3- नवा*--आवाज़
4- क़यास*--अनुमान

'दुल्हन एक तलाक़-शुदा-सी अंदर घर के बैठी है'


(60)
चुप बाहर के दरवाज़े पर सच-ना सच का किस्सा अब
झूठ हलफ़नामे लिखने पर अफ़सोस नहीं होता अब

टेढ़ी-तिरछी बातें हरदम ज़हन में आती रहती है
पैंसिल से काग़ज़ पर भी सीधा ख़त* नहीं खिंचता अब

दुल्हन एक तलाक़-शुदा-सी अंदर घर के बैठी है
पूछूँ कितना बाक़ी है अर्सा उसकी इद्दत* का अब

कुछ अनदेखी आँखें हरदम जलती-बुझती रहती हैं
ख़ुद अपने दामन पर भी अपना ज़ोर नहीं चलता अब

अपने हों या और किसी के सारे दुख बेमानी हैं
पहलू-पहलू दर्द जगाकर दिल ये हक़ीक़त समझा अब

1-ख़त*--रेखा
2-इद्दत*--वह अवधि जो तलाक़ के बाद मुस्लिम औरत को कठोर पर्दे में व्यतीत करना पड़ता है

'गुमशुदा अक्स* को आईने में लाकर रख लूँ'


(59)
गुमशुदा अक्स* को आईने में लाकर रख लूँ
मै भी पत्थर में कोई फूल उगाकर रख लूँ

कम नज़र* मैं लहूँ, तहे ज़ात की दोहरी-तिहरी
नार-साई* मैं तुझे दोस्त बनाकर रख लूँ

अब तो ऐसा भी नहीं छोड़ ही जाए कोई शाम
याद ऐसी, जिसे सीने से लगाकर रख लूँ

सर्द रातों में कभी जिससे तपिश* मिलती थी
अब वो अंगारा हथेली पे उठाकर रख लूँ

विस्फ़-शब* आएगा इक शख़्स बुझाने वाला
ताक़े-दिल तुझमें कोई शमा जलाकर रख लूँ

मुझसे वाबस्ता है अब तक वही कातिल चेहरा
जिंदगी! काश तुझे ख़ुद से बचाकर रख लूँ

1- अक्स*--बिंब
2- कम नज़र*--कम समझ वाला
3- नार-साई*--यथार्थ तक न पहुंच पाने की स्थिति
4-तपिश* --गर्मी
5-विस्फ़-शब*--आधी रात

'दहक रहा था मगर बेज़बान मुझ-सा था'

(58)
दहक रहा था मगर बेज़बान मुझ-सा था
कि रात सर पे मेरे आसमान मुझ-सा था

सभी अज़ीज़ थे उसके मगर नहीं था वही
वो एक शख़्स कि बे-ख़नादान मुझ-सा था

छतों से चिपकी हुई बेसदा अबाबीलें
अँधेरी रात में ख़ाली मकान मुझ-सा था

लहू में काई जमी थी मगर बुरा न लगा
मेरे सिवा भी कोई ख़ुश-गुमान मुझ-सा था

कटी-फटी सी जमीने, झुके-झुके से शजर
क़रीब जाके जो देखा, जहान मुझ-सा था

पसीना उसका न टपका तेरे लहू पर कहीं
वफ़ा की राह में वो भी जवान मुझ-सा था

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

'रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त'

(57)
रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त
आख़िर लिखना भूल गई, वो हर दिन लिखने वाली ख़त

इल्म* नहीं है शायद उसको मैं हूँ एहद् सवालों का
आनेवाली रूत ने भेजा मेरे नाम जवाबी ख़त

हाथ से मेरे छूट गई तब, क़ौसे-कुज़ह की धारी इक
वापस जाते वक़्त का मंज़र उसकी पुश्त का वस्ती* ख़त

अव्वल-अव्वल पुर रहते थे लाख निजी तफ़सीलों से
रफ़्ता-रफ़्ता खो बैठे फिर अगली जैसे दराज़ी ख़त

पढ़ते-पढ़ते पी जाती थीं, आँखें ख़त के लफ्ज़ों को
आज जो देखा चाट रहे थे अपनी आप सियाही ख़त

उसके मेरी क़ौले-क़सम* पर देख गवाही देते हैं
राख में आतिश-दानों की अंजाम-रसीदा* दस्ती* ख़त

1- इल्म*--ज्ञान
2- वस्ती* --इंद्र धनुष
3- दरमियानी
4-विस्तार
5-परिणाम को पहुँचे हुए
6-पत्रवाहक द्वारा भेजे गए

सोमवार, 19 सितंबर 2011

'कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह'

(56)
कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह
अजीब बादल का सायबाँ-सा मुझे मिला वह
      
वो जिसकी संगत में मैंने समझे समय के मानी
पलट के इक उम्र-रायगाँ* सा मुझे मिला वह

वो मुझ मुसाफ़िर की क्या तवाज़ो* ग़रीब करता
ख़ुद अपने घर ही में मेहमाँ सा मुझे मिला वह

तमाज़तें* गर्मियों के दिन की करीब-तर थीं
निकलते जाड़ों के आस्माँ-सा मुझे मिला वह

मैं छोड़ आया था सब्त* जिस पर शिनाख़्त अपनी
महावटों में धुले मकाँ-सा मुझे मिला वह

मैं कैसे उसको गए दिनों का हिसाब दूँगा
जो अब मुजस्सम ग़मे-जियाँ-सा* मुझे मिला वह

1- उम्र-रायगाँ*--व्यर्थ जाने वाली उम्र
2- तवाज़ो*--आदर-सत्कार
3- तमाज़तें* --तपन
4- सब्त* अंकित
5- ग़मे-जियाँ-सा*--हानि का साकार रूप