सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

'ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से'

(81)
ज़मीं-ज़मीं गुनाह है सजे हुए गुलाब से
हज़ार बार उम्मतें* गुज़र चुकीं अज़ाब से

ये दिल में था कि आज शब बिताएँ अपने साथ हम
निकल-निकल के आ गई इबारतें किताब से

गुज़र रहा हूँ तिशना-लब* मैं ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* से
मुझी में हैं बिछे हुए क़दम-क़दम सराब* से

मकाँ वहीं हैं शहर में, मगर मकीं* नहीं हैं वो
किसे ख़बर कहाँ गए, वो ख़ुश-बदन गुलाब से

लगा कि जिस्मों-रूह में भड़क उठी है आग फिर
जनम-जनम कि तिश्नगी बुझी कहाँ शराब से

1- उम्मतें*--राष्ट्र
2- तिशना-लब*--प्यासा
3- ख़्वाब-ज़ारे जीस्त* --जीवन के स्वप्नलोक से
4- सराब* --बादल
5- मकीं*--मकानों के निवासी

'चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे'

चुप थे बरगद, ख़ुश्क मौसम का गिला करते न थे
चल रही थी आँधियाँ, पत्ते सदा* करते न थे

मुतमइन* थे एहले-मक़तल*, नीम-जाँ* करके मुझे
कैसी होशियारी थी सर तन से जुदा करते न थे

हमको किस शब जिंदा रहने की हवस होती न थी
दिन में कब हम ख़ुदकुशी का फ़ैसला करते न थे

बंद था जिसमें मेरी आँखों का सागर बूँद-बूँद
मेरे ख़ेतों को वो बादल भी हरा करते न थे

कैसे दूर-अंदेश* मुंसिफ थे कि इंसाफ़ न मुझे
मानते थे बेख़ता लेकिन रिहा करते न थे।

1- सदा*--आवाज़
2- मुतमइन*--संतुष्ट
3- एहले-मक़तल*--वधस्थल के लोग
4- नीम-जाँ*--मरणासन्न
5- दूर-अंदेश*--दूरदर्शी

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

'अब तमाशा देखने वालों में हमसाया भी है'

(79)
इल्म किसको था कि तरसीले-हवा* रूक जाएगी
अगले मौसम तक मेरी नशवो-नुमा* रूक जाएगी

तू ही क्यों नादिम* है इतनी मेरे घर की आबरू
किसके सर पर ऐसी आँधी में रिदा* रुक जाएगी

अब तमाशा देखने वालों में हमसाया भी है
टूटती छत मेरे चिल्लाने से क्या रूक जाएगी

कल न होगा कोई इस बस्ती में मेरे मंतज़िर
कल मेरे तलुओं ही में आवाज़े-पा* रुक जाएगी

क्या तहफ़्फ़ज़* दे सकेगी मुझको बज़-ए-एहतियात
क्या दरीचे मूँद लेने से बला रुक जाएगी

1- तरसीले-हवा*-- हवा की उपलब्धि
2- नशवो-नुमा*--बढत
3- नादिम*--लज्जित
4- रिदा*--चादर
5- आवाज़े-पा*--पदचाप
6- तहफ़्फ़ज़*--सुरक्षा
7- बज़-ए-एहतियात--सावधानी का अंदाज़

'रूख पे भूली हुई पहचान का डर तो आया'

(78)
रूख पे भूली हुई पहचान का डर तो आया
कम-से-कम भीड़ में इक शख़्स नज़र तो आया

मेरे सीने की तरफ़ खुद मेरे नाख़ुन लपके
आखि़र इस ज़ख़्म की टहनी पे समर तो आया

कट गया मुझसे मेरी ज़ात का रिश्ता लेकिन
मुझको इस शहर में जीने का हुनर तो आया

कुछ तो सोए हुए एहसास के बाज़ू थिरके
पाँव से उठके भँवर ता-ब-कमर तो आया

तन की मिट्टी में उगा ज़हर का पौधा चुपचाप
मुझमें बदली हुई दुनिया का असर तो आया

1- समर --फल
2- ता-ब-कमर--कमर तक

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

'रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था'

(77)
रूख़ बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे, मगर ऐसा भी था

लौट आती थीं कई साबिक़* पतों की चिट्ठियाँ
घर बदल देते थे बाशिंदे, नगर ऐसा भी था

वो किसी का भी न था लेकिन था सबका मोतबर*
कोई क्या जाने कि उसमें इक हुनर ऐसा भी था

तोलता था इक को इक अशयाए-मशरफ़*  की तरह
दोस्ती थी और अंदाज़े-नज़र ऐसा भी था

पाँव आइंदा*  की जानिब, सर गुजिश्ता*  की तरफ़
यों भी चलते थे मुसाफिर, इक सफ़र ऐसा भी था

हर नई रूत में बदल जाती थी तख़्ती नाम की
जिसको हम अपना समझते कोई घर ऐसा भी था

1-पुराने
2-विश्वसनीय
3-उपयोग की वस्तुएं
4-भविष्य
5-अतीत

'वो रेगिस्तान ले जाते तो सागर छोड़ जाते थे'

(76)
मुसाफ़िर-ख़ाना-ए-इम्काँ* में बिस्तर छोड़ जाते थे
वो हम थे जो चिरागों को मुनव्वर* छोड़ जाते थे

गरज़तें-गूँजते आते थे जो सुनसान सहरा में
वही बादल अजब वीरान मंज़र छोड़ जाते थे

न थी मालूम भूखी नस्ल की मजबूरियाँ उनको
फटी चादर वो तलवारों के ऊपर छोड़ जाते थे

नहीं कुछ एतबार अब क़ुफ़्लों -दरबाँ* का,कभी हम भी
पड़ोसी के भरोसे पर खुला घर छोड़ जाते थे

कभी आँधी का ख़दशा*  था, कभी तूफाँ का अंदेशा
वो रेगिस्तान ले जाते तो सागर छोड़ जाते थे

1-संभावनाओं का यात्री घर
2- रोशन
3-ताले और चौकीदार
4-आशंका

'सामने परबत भी हैं, कुछ लोग कहते आए थे'

(75)
सामने परबत भी हैं, कुछ लोग कहते आए थे
हम तो बस हमवार मैदानों में बहते आए थे

अब की बरखा कर गई मिस्सार तो हैरत ही क्या
यो दरो-दीवार तो बरसों से ढहते आए थे

आख़िर-आख़िर अब वही मेआर* ठहरा जीस्त का
लोग जिस अंदाज़ को मायूब कहते आए थे

कौन जाने किसलिए चूल्हे का ईंधन बन गए
ये शजर*तो मौसमों की मार सहते आए थे

अब के क्या अदबार* आया, ख़्वाब तक गहना गए
चाँद, सूरज तो हमेशा से ही गहते आए थे
1-स्तर
2-दूषित
3-अशुद्ध
4-संकट, विपदा