बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

'वो जो पल ख़ाली हुआ, मर कर बसर मेरा हुआ'

(74)
इस तरह हर मरहला* ना-मोतबर*मेरा हुआ
पाँव गोया दूसरों के थे, सफ़र मेरा हुआ

उसका सन्नाटा ग़ज़ब था, इसका हंगामा ग़ज़ब
दश्त कब मेरा हुआ था, कब नगर मेरा हुआ

यों लगा जैसे मैं आवाज़ों के इक जंगल में हूँ
जब कभी शहरे-ख़मोशाँ*से गुज़र मेरा हुआ

कुछ तो दो शहरे-हवस में दाद इस किरदार*की
कल जो था सफ़्फ़ाक दुश्मन, चारागर*मेरा हुआ

दोस्तों! औकात-बेकरारी को फुर्सत मत कहो
वो जो पल ख़ाली हुआ, मरकर बसर मेरा हुआ

1-मंज़िल के लिए कूच
2-अविश्वसनिय
3-कब्रिस्तान
4-चरित्र
5-उपचारक

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

'देखा नहीं देखे हुए मंज़र के सिवा कुछ'

(73)
देखा नहीं देखे हुए मंज़र के सिवा कुछ
हासिल न हुआ सैरे-मुकर्रर* के सिवा कुछ

किस हाल में उस शोख़ से वाबस्ता हुआ दिल
सौगात में देने को नहीं सर के सिवा कुछ

क्यों गर्द-सी उड़ती है ये हर लम्हा रगों में
क्या जिस्म के अंदर नहीं सरसर* के सिवा कुछ

फूलों से बदन डूबते देखे गए हर बार
इस बहर* में तैरा नहीं पत्थर के सिवा कुछ

करते भी तलब क्या कि यहाँ दस्ते अता* में
देने को न था जिन्से-मयस्सर* के सिवा कुछ

1- सैरे-मुकर्रर*--एक ही स्थान पर दुबारा
2- उपहार
3-सरसर*--आँधी
4-बहर*--सागर
5-दस्ते अता*--दया का हाथ
6-जिन्से-मयस्सर*--पहले से प्राप्त वस्तु

'दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती'

(72)
शज़र* आँगन का जब सूरज से लरज़ा* होने लगता था
कोई साया मेरे घर का निगहबाँ* होने लगता था

दुआ पढ़कर मेरी माँ जब मेरे सीने पे दम करती
अक़ीदों* के अंधेरे में चिरागाँ होने लगता था

पुराने पेड़ फिर ताज़ा फलों से लदने लगते थे
गए मौसम से दिल जब भी गुरेज़ाँ* होने लगता था

चुनौती देने लगती थी नई दुशवारियाँ मुझको
सफ़र जब ज़िंदगी का मुझ पे आसाँ होने लगता था

बताऊँ क्या कि कैसा बा-मुरव्वत शख़्स था वो भी
मुझे इलज़ाम देकर ख़ुद पशेमाँ* होने लगता था

1-शज़र*--वृक्ष
2-लरज़ा*--कंपित
3-निगहबाँ*--रक्षक
4-गुरेज़ाँ*--आस्थाओं
5-बा-मुरव्वत--उदासीन
6-पशेमाँ*--लज्जित

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

'अच्छे दिनों की आस में दीवारों-दर हैं चुप'

(71)
सामान दिलदही* का न राहत घरों में है
दिन-रात का सफ़र है, सकूनत* घरों में है

दस्तक पे दोस्तों के भी खुलते नहीं हैं दर
हर वक़्त इक अजीब-सी दहशत घरों में है

क्या फिर कहीं पे कोई बड़ा हादिसा हुआ
क्यों आज इतनी भीड़ इबादत-घरों में है

बुनियाद इख़्तलाफ़* की कुछ भी नहीं मगर
मौजूद बेसबब-सी रक़ाबत* घरों में है

अच्छे दिनों की आस में दीवारों-दर हैं चुप
सड़कों पे कहक़हे हैं, हक़ीक़त घरों में है

जंगल में जा बसेंगे अगर आफ़ियत मिले
अब तक यक़ीन था कि हिफ़ाज़त घरों में है

1- दिलदही* --मन-बहलाव
2- सकूनत*आवास
3- इख़्तलाफ़*--मतभेद
4- रक़ाबत*शत्रुता

'वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था'

(70)
ज़िंदगी को ज़र-ब-कफ़*, ज़र-फ़ाम* करना सीखते
कौन था वो, किससे हम आराम करना सीखते

वक्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था
सरफिरी शामों को नज़रे-जाम करना सीखते

सीख लेते काश हम भी कोई कारे-सूद-मंद*
शेर-गोई छोड़ देते, काम करना सीखते

ख़ुद-ब-ख़ुद तय हो गए शामों-सहर अच्छा था मैं
सुबह करना सीख लेते, शाम करना सीखते

क़द्र है जब शोरो-ग़ोग़ा* की तो हज़रत आप भई
गीत क्यों गाते रहे, कोहराम करना सीखते

1- ज़र--कफ़--मुट्ठियों में सोना
2- ज़र-फ़ाम*--सोने जैसा रंग
3- कारे-सूद-मंद*--लाभदायक
4- शोरो-ग़ोग़ा*--शोर-शराबा

'नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके'

(69)
नदी के सय्याल* रास्ते से लहू में चुपचाप हल हुआ दिन
ग़रूब* के वक़्त आस्माँ के किनारे-ज़ेरी* में खूँ-शुदा* दिन

मथी हुई मिट्टियों के अंदर छुपी हुई है शबीह* मेरी
मैं एक से दूसरी तरफ़ के सफ़र में हूँ दरदियान का दिन

तुम्हें भी तन्हाइयों में अपनी शरीक करना कहाँ था मुमकिन
कि सर्द बिस्तर पे रात मेरे बदन-बरहना* पड़ा रहा दिन

नशा कहाँ है वो ख़्वाब जैसा कि आज तक थी सबब से जिसके
घरों में काफ़ूर जैसी शामें, सफ़र में हलका सहाब-सा दिन

उदास कमरे में अपने तन्हा, बख़ील* लम्हों से लौ लगाते
इक और हमने गुज़ार दी शब, इक और हमने गँवा दिया दिन

1- सय्याल*--तरल
2- ग़रूब* --सूर्यास्त
3- किनारे-ज़ेरी*--निचले किनारे
4- खूँ-शुदा* --खून में परिवर्तित
5- शबीह*-- सूरत
6- बदन-बरहना* --नग्न
7- बख़ील*--कंजूस

'ऐ जंगल की बेमानी चुप, शहरों के दीवाने शोर'

(68)
ऐ-जाँ! कब तक क़ता* न होता, झूठा-सच्चा साथ तेरा
कमज़ोर पतंग बारीक हुआ, बिलाख़िर छूटा साथ तेरा

कैसे मुमकिन तुझसे बचना, चारों खूँट ऐ बहती हवा
सहरा-सहरा संगत तेरी, रस्ता-रस्ता साथ तेरा

उड़ते जाते वक़्त बता अनजाने पन का भेद है क्या
मेरी तबीअत ज्यों की त्यों और बदला-बदला साथ तेरा

ऐ जंगल की बेमानी चुप, शहरों के दीवाने शोर
बेकार गिला तन्हाई का ख़ुद हमने छोड़ा साथ तेरा

इक रूख़ तेरा दिलकश इतना, इक रूख़ नामरग़ूब* बहुत
लेकिन मेरी आदत ठहरा, कड़ुआ-मीठा साथ तेरा

1- क़ता* --विच्छेद
2- नामरग़ूब* --अस्वीकार्य