सोमवार, 26 सितंबर 2011

'गुमशुदा अक्स* को आईने में लाकर रख लूँ'


(59)
गुमशुदा अक्स* को आईने में लाकर रख लूँ
मै भी पत्थर में कोई फूल उगाकर रख लूँ

कम नज़र* मैं लहूँ, तहे ज़ात की दोहरी-तिहरी
नार-साई* मैं तुझे दोस्त बनाकर रख लूँ

अब तो ऐसा भी नहीं छोड़ ही जाए कोई शाम
याद ऐसी, जिसे सीने से लगाकर रख लूँ

सर्द रातों में कभी जिससे तपिश* मिलती थी
अब वो अंगारा हथेली पे उठाकर रख लूँ

विस्फ़-शब* आएगा इक शख़्स बुझाने वाला
ताक़े-दिल तुझमें कोई शमा जलाकर रख लूँ

मुझसे वाबस्ता है अब तक वही कातिल चेहरा
जिंदगी! काश तुझे ख़ुद से बचाकर रख लूँ

1- अक्स*--बिंब
2- कम नज़र*--कम समझ वाला
3- नार-साई*--यथार्थ तक न पहुंच पाने की स्थिति
4-तपिश* --गर्मी
5-विस्फ़-शब*--आधी रात

'दहक रहा था मगर बेज़बान मुझ-सा था'

(58)
दहक रहा था मगर बेज़बान मुझ-सा था
कि रात सर पे मेरे आसमान मुझ-सा था

सभी अज़ीज़ थे उसके मगर नहीं था वही
वो एक शख़्स कि बे-ख़नादान मुझ-सा था

छतों से चिपकी हुई बेसदा अबाबीलें
अँधेरी रात में ख़ाली मकान मुझ-सा था

लहू में काई जमी थी मगर बुरा न लगा
मेरे सिवा भी कोई ख़ुश-गुमान मुझ-सा था

कटी-फटी सी जमीने, झुके-झुके से शजर
क़रीब जाके जो देखा, जहान मुझ-सा था

पसीना उसका न टपका तेरे लहू पर कहीं
वफ़ा की राह में वो भी जवान मुझ-सा था

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

'रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त'

(57)
रोज़ बदलते मौसम जैसा ग़ैर-यक़ीनी यानी ख़त
आख़िर लिखना भूल गई, वो हर दिन लिखने वाली ख़त

इल्म* नहीं है शायद उसको मैं हूँ एहद् सवालों का
आनेवाली रूत ने भेजा मेरे नाम जवाबी ख़त

हाथ से मेरे छूट गई तब, क़ौसे-कुज़ह की धारी इक
वापस जाते वक़्त का मंज़र उसकी पुश्त का वस्ती* ख़त

अव्वल-अव्वल पुर रहते थे लाख निजी तफ़सीलों से
रफ़्ता-रफ़्ता खो बैठे फिर अगली जैसे दराज़ी ख़त

पढ़ते-पढ़ते पी जाती थीं, आँखें ख़त के लफ्ज़ों को
आज जो देखा चाट रहे थे अपनी आप सियाही ख़त

उसके मेरी क़ौले-क़सम* पर देख गवाही देते हैं
राख में आतिश-दानों की अंजाम-रसीदा* दस्ती* ख़त

1- इल्म*--ज्ञान
2- वस्ती* --इंद्र धनुष
3- दरमियानी
4-विस्तार
5-परिणाम को पहुँचे हुए
6-पत्रवाहक द्वारा भेजे गए

सोमवार, 19 सितंबर 2011

'कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह'

(56)
कभी हक़ीक़त, कभी गुमाँ-सा मुझे मिला वह
अजीब बादल का सायबाँ-सा मुझे मिला वह
      
वो जिसकी संगत में मैंने समझे समय के मानी
पलट के इक उम्र-रायगाँ* सा मुझे मिला वह

वो मुझ मुसाफ़िर की क्या तवाज़ो* ग़रीब करता
ख़ुद अपने घर ही में मेहमाँ सा मुझे मिला वह

तमाज़तें* गर्मियों के दिन की करीब-तर थीं
निकलते जाड़ों के आस्माँ-सा मुझे मिला वह

मैं छोड़ आया था सब्त* जिस पर शिनाख़्त अपनी
महावटों में धुले मकाँ-सा मुझे मिला वह

मैं कैसे उसको गए दिनों का हिसाब दूँगा
जो अब मुजस्सम ग़मे-जियाँ-सा* मुझे मिला वह

1- उम्र-रायगाँ*--व्यर्थ जाने वाली उम्र
2- तवाज़ो*--आदर-सत्कार
3- तमाज़तें* --तपन
4- सब्त* अंकित
5- ग़मे-जियाँ-सा*--हानि का साकार रूप

बुधवार, 14 सितंबर 2011

'अपने दिल में जीने का अरमान न ला'

(55)
अक्स पुराना दे न सके तो दरपन पर बहुतान न ला
मेरे पुराने चाहत-नामे वापस मेरी जान न ला

बादल घिर-घिर आते थे जब चिड़ियाँ रेत नहाती थीं
वो दिन कब के बीत गए, उन बातों पर ईमान न ला

कुछ और नए हथियार जुटा, और वार करे तो सोच के कर
मेरी छाती पत्थर की है, अब वो पुराने बान न ला

शाम के नेमत-ख़ाने में कल सुब्ह की ख़ातिर छोड़ न कुछ
कल का आलम किसने देखा, कल के लिए सामान न ला

ज़िंदा रहकर जान ग़नीमत साँस के आने जाने को
इससे बढ़कर अपने दिल में जीने का अरमान न ला

इज़्ज़त जिसका नाम है भाई, वो है नाज़ुक चीज़ बहुत
बस्ती-बस्ती घूम के घर आ, साथ मगर मेहमान न ला

1- बिंब
2- प्रेमपत्र
3- रसोई की अलमारी

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

'प्यार की मीठी बात कहो तो...'

(54)
प्यार की मीठी बात कहो तो बोझल उसकी तबीअत हो
कमसिन लड़की ऐसी, जैसे पुख़्ता उम्र की औरत हो

अब भी अक्सर आता है यों ध्यान पुराने रिश्तों का
जैसे दुनियाभर बशर की आदत वजहे-इबादत* हो

अब कि तअल्लुक़ मुश्किल फ़न है, मुझसे फ़क़त वो शख़्स मिले
हस्बे-ज़रूरत* हंसना-रोना, जिसको इसमें महारत हो

आख़िर क़ायल हम भी हुए हैं थककर उसकी दलीलों से
शिकवा करके सोचा यह था, शायद उसको नदामत हो

दर्द के ख़ोशे* चुनते-चुनते हाथ मेरे पथारने लगे
फ़स्ल को तेरी आग लगा दूँ, ऐ दिल अब तो इज़ाजत हो

1- वजहे-इबादत*--पूजा पाठ का कारण
2- हस्बे-ज़रूरत*--आवश्यकतानुसार
3- ख़ोशे*--दाने

'पर्दा उठना था कि....'

(53)
पर्दा उठना था कि हिद्दत* धूप की मजर में थी
हम थे और उम्मीद की बेचारगी* मंज़र में थी

अपनी ख़स्ता चाहतें जब लेके हम रूख़्सत हुए
ख़ुश्क पत्तों से हवा की दोस्ती मंज़र में थी

टूटकर क़ौसे-क़ज़ह* से क़हक़हा करते थे रंग
इस उफ़ुक़* से उस उफ़ुक़ तक बेबसी मंज़र में थी

बुझ रहा था दिन की पेशानी पे सूरज का जलाल
तीरगी* के बीच कुछ-कुछ रोशनी मंज़र में थी

बह रही थी दूध-सी इक शय जटाओं से मेरी
रात पस-मंज़र* की सारी चाँदनी मंज़र में थी

1- हिद्दत*--गर्मी
2- बेचारगी*--बेबसी
3- क़ौसे-क़ज़ह*--इंद्र धनुष
4- उफ़ुक़*--क्षितिज
5- तीरगी*--अंधकार
6- पस-मंज़र*--पृष्ठभूमि