बुधवार, 1 अगस्त 2012

न चलने दूँ लहू में आँधियाँ अब

(100)
न चलने दूँ लहू में आँधियाँ अब
हुई है गोद की बच्ची जवाँ अब

उदासी से भरे गुमसुम घरों में
तमाशा बन गईं परछाईंयाँ अब

भरोसा किसको है पैरों पे अपने
ज़रूरी हो गईं बैसाखियाँ अब

बज़ाहिर पुर-सकूँ* शहरे-हवस* में
लड़ा करती हैं बाहम* कुर्सियाँ अब

बढ़ा क़र्ज़ा मगर खाते में अपने
लिखी जाने लगीं खुशहालियाँ अब

ज़मीनें बाँझ होती जा रही हैं
लहू पीने लगीं आबादियाँ अब

1- पुर-सकूँ*-शांत
2-शहरे-हवस*-स्वार्थों का नगर
3-बाहम*-परस्पर

बुधवार, 11 जुलाई 2012

भूलकर भी अब न उस बुत को सरापा* सोचना

(99)
भूलकर भी अब न उस बुत को सरापा* सोचना
आइने के सामने अपना ही चेहरा सोचना

गुफ़्तगू में उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ बोलना
और तनहाई में इस ज़ालिम का रूतबा सोचना

रू-ब-रू जब तक रहें अपनों से रहना बदगुमाँ
जब बिछुड़ जाएँ तो अपनों को प्यारा सोचना

तिश्ना-लब* सोना मगर ख़्वाबों में दरिया देखना
दरमियाँ सागर के रहना, खुद को प्यासा सोचना

आदमी और अंजुमन* के बीच निस्बत* ढूँढ़ना
भीड़ में ख़ामोश रहना, घर में क्या-क्या सोचना

बैठ जाना बूँद पड़ते ही बताशे की तरह
फिर भी अपने आपको पत्थर का टुकड़ा सोचना

1- सर से पाँव तक,छवि
2-प्यासा
3-सभा
4-संबंध

बुधवार, 6 जून 2012

आदमी को बेवतन, घर को जज़ीरा मान लूँ

(98)
आदमी को बेवतन, घर को जज़ीरा मान लूँ
क्यों न अब ख़ुद को भी इस मंज़र का हिस्सा मान लूँ

क़हक़हों की गूँज से लरज़ा न दूँ दीवारों-दर
क्यों न हर ज़हमत* को अब पल भर का क़िस्सा मान लूँ

निस्बतें* जो कल बनेंगी उनका अंदाज़ा करूँ
टूटते रिश्तों को मौसम का तक़ाज़ा मान लूँ

वो ही तेवर के नियाज़ी थे, वही अंदाज़ों-रंग
क्यों न हर चेहरे को अब तेरा ही चेहरा मान लूँ

हिल गई बुनियाद लेकिन बामो-दर टूटे नहीं
वक़्त से पहले ही क्यों दिल को शकिस्ता* मान लूँ

क्या ख़बर वो बस्तियाँ, वो लोग अब बाक़ी न हों
रास्ते से लौट जाऊँ दिल का कहना मान लूँ
1- कष्ट
2-रिश्ते
3-खंडित

तू मेरी बेहिसाब माँ

(97)
वही हूँ मैं, वही ज़मीं, वही है माहताब माँ
बस एक गुल बहिश्त* का हुआ है ख़्वाब-ख़्वाब मां

मेरी नज़र में आज भी खिली है कहकशाँ-सी* तू
मैं यक़-क़दह* लहू तेरा, तू मेरी बेहिसाब माँ

न सोचना कि हक़ तेरा अदा न मुझसे हो सका
कि तेरे-मेरे दरमियाँ न था कोई हिसाब माँ

सफ़ेद हो चला हूँ अब तेरे कफ़न के रंग-सा
कभी उठा के देख तो यह क़ब्र की नक़ाब माँ

रखा तो होगा जेब में उसी तरह क़लम तेरा 
कभी तो भेज ख़त मुझे, कभी तो भेज जवाब माँ

1- स्वर्ग
2- आकाश गंगा
3- प्याला भर

रविवार, 6 मई 2012

टूटकर भी आइना अक्स-आशना है जाने-मन

टूटकर भी आइना अक्स-आशना* है जाने-मन
इस तरह जीने का किसको हौसला है जाने-मन

कुछ-न-कुछ तो है तअल्लुक़ अब वो जुज़वन* ही सही
सबका सब तो कौन किसका हो सका है जाने-मन

ज़िंदगी भर कौन किसका साथ देता है यहाँ
एक लम्हे की वफ़ा भी तो वफ़ा है जाने-मन

लफ़्ज़ पर विश्वास करना भी है लाचारी मेरी
कौन किसके अंदरूँ* को जानता है जाने-मन

अब असर-अंदाज़* कोई सानेहा होता नहीं
अब कि दिल सीने में पत्थर हो चुका है जाने-मन

1-प्रतिबिंब से जुड़ा हुआ
2-आंशिक
3-भीतर, मनःस्थिति
4-असर करने वाला


बुधवार, 21 मार्च 2012

'घर के रोशनदानों में अब काले पर्दे लटका दे'

(95)

घर के रोशनदानों में अब काले पर्दे लटका दे
रातों के मटियालेपन को थोड़ा और अँधेरा दे

दिन में सपने देखने वाले रस्ता-रस्ता बिखरे हैं
प्यासे दिल को दे न तमन्ना, दे तो साथ वसीला दे

शहर से जब भी लौट के आऊँ, देखूँ, सोचूँ, हैरत हो
सीधा-सादा बरगद अब भी धूप सहे और साया दे

लौटा तो अख़बार पुराना, बोला मेरी तलावत* कर
कमरे की दीवार का धब्बा, चीख़ा मुझको चेहरा दे

शहर की छीना-झपटी में सब अपने लोग मुक़ाबिल हैं
आलम अफ़रा-तफ़री का है, कौन किसी को मौक़ा दे

अक़्लो-हुनर* का मोल नहीं है, बस्ती में बंजारों की
मुझसे मेरी दानिश ले ले, लेकिन मौला पैसा दे

1- तलावत--अध्ययन
2- अक़्लो-हुनर--बुद्धि


मंगलवार, 20 मार्च 2012

'चुन रहा हूँ, सुबह को अँगनाई में बैठा हुआ'

(94)

चुन रहा हूँ, सुबह को अँगनाई में बैठा हुआ
दाना-दाना रात के खलिहान का बिखरा हुआ

आ, कि अब इस खोखलेपन पर हँसें बेसाख़्ता
तेरे आँसू तयशुदा थे, मेरा ग़म सोचा हुआ

उससे क्या कहता कि मेरी रूह छलनी हो गई
दोस्त था, इज़हारे-हमदर्दी से आसूदा हुआ

हादिसा ये घर के जलने से भी था संगीन-तर
उसके होठों पर मिला इक क़हक़हा चिपका हुआ

अब की बरखा में ये टूटी छतरियाँ काफ़ी नहीं
आँधियाँ उठने को हैं, बादल बहुत गहरा हुआ

1- इज़हारे-हमदर्दी--साहनुभूति की अभिव्यक्ति
2- आसूदा--संतुष्ट प्रसन्न