मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

'सुरमई धूप में दिन-सा नहीं होने पाता'

(110)

सुरमई धूप में दिन-सा नहीं होने पाता
धुंध वो है कि उजाला नहीं होने पाता

देने लगता है कोई ज़हन के दर पर दस्तक
नींद में भी तो मैं तनहा नहीं होने पाता

घेर लेती हैं मुझे फिर से अँधेरी रातें
मेरी दुनिया में सवेरा नहीं होने पाता

छीन लेते हैं उसे भी तो अयादत वाले*
दुख का एक पल भी  तो मेरा नहीं होने पाता

सख़्त*-जानी मेरी क्या चीज़ है हैरत-हैरत
चोट खाता हूँ शकिस्ता नहीं होने पाता

लाख चाहा है मगर ये दिले-वहशी दुनिया
तेरे हाथों का खिलौना नहीं होने पाता

1-अयादत वाले*--तीमारदार
2- सख़्त*--कठोरता

'मुझे अपना तो क्या, मेरा पता देता नहीं कोई'

(109)

मुझे अपना तो क्या, मेरा पता देता नहीं कोई
भटकता हूँ घने वन में, सदा देता नहीं कोई

बता ऐ शहरे-नाशुक्राँ*, ये क्या तर्ज़-गदाई* है
तलब करते हैं सब, लेकिन दुआ देता नहीं कोई

यहाँ ज़ालिम जुईफ़ों से सहारे छीन लेते हैं
यहाँ कमज़ोर बाहों को असा* देता नहीं कोई

ख़ुदा जाने कहाँ होंगे वो मुशाफ़िक़* दामनों वाले
तपिश* सहता हूँ, दामन की हवा देता नहीं कोई

मेरे माथे के धब्बों पर ये दुनिया तन्ज़ करती है
मगर हाथों में मेरे आइना देता नहीं कोई

अब अक्सर सोचता हूँ मेरा मर जाना ही बेहतर है
कि बिमारी में ज़िद करके दवा देता नहीं कोई

1- शहरे-नाशुक्राँ*--एहसान न मानने वालों का शहर
2- तर्ज़-गदाई--भीख लेने का ढंग
3- असा*--छड़ी
4- मुशाफ़िक़*--प्रेमपूर्ण
5- तपिश*तपन

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

गोशा-ए-उज़लत* में चुप बैठे हुए अर्सा हुआ

(108)

गोशा-ए-उज़लत* में चुप बैठे हुए अर्सा हुआ
शहरे-हमददाँ!  तुझे देखे हुए अर्सा हुआ

है ख़याले-दोस्त ही बाक़ी, न यादे-वस्ले-दोस्त
हिज़्र की रुत को भी अब भूले हुए अर्सा हुआ

ज़िदंगी में क्या कहूँ, काटे हैं कितने रतजगे
मुख़्तसर ये है कि अब जागे हुए अर्सा हुआ

दिन को तहख़ाने में जलना, शब को बाहर ताक़ में
इस दिए को दोस्तों! जलते हुए अर्सा हुआ

अब ये पत्थर चोट खाकर भी सदा देता नहीं
चुप हुए मुद्दत हुई बिखरे हुए अर्सा हुआ

1- गोशा-ए-उज़लत--एकांत

'सुबह का सूरज उगा, फिर क्या हुआ मत पूछिए'



(107)

सुबह का सूरज उगा, फिर क्या हुआ मत पूछिए
ओस के क़तरों से सागर का पता मत पूछिए

बस सफ़र, पैहम* सफ़र, दायम,* मुसलसल बेक़याम*
चलते रहिए, चलते रहिए, फ़ासला मत पूछिए

ज़िंदगी का रूप यकसाँ*, तजरुबे सबके अलग
इस समर* का भूलकर भी ज़ायक़ा मत पूछिए

मान भी लीजे नमूना ख़स्ता-हाली* को मेरी
मुझसे अपने शहर की आबो-हवा मत पूछिए


क्या ख़बर है कौन किस अंदाज़, किस आलम में हो
दोस्तों से उनके मसकन* का पता मत पूछिए

1-निरंतर
2-सदैव
3-बिना रुके
4-समान,एक जैसा
5-फल
6-दुर्दशा
7-घर

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

क्यों हर तरफ़ धुआँ ही धुआँ है बता मुझे

(106)

क्यों हर तरफ़ धुआँ ही धुआँ है बता मुझे
क्या ये ही शहरे-शोला-रुख़ाँ* है बता मुझे

वो फ़स्ल कौन-सी, जिसे सींचते हैं अश्क
दरिया ये किस जहत* में रवाँ है बता मुझे

देता नहीं है कोई यहाँ उम्रभर का साथ
कल तक जो हमसफ़र था, कहाँ है बता मुझे

क्यों कारोबारे-शौक़ से उकता गए हैं लोग
दिल के सिवा जो इसमें ज़ियाँ* है बता मुझे

तू मेरे साथ-साथ रहा है, सबूत दे
किस रास्ते पे मेरा मकाँ है बता मुझे

जब मैं नहीं तो मुझको मेरी शोहरतों से क्या
किस काम का ये नामो-निशाँ है बता मुझे

1- शहरे-शोला-रुख़ाँ*-सुंदर चेहरों का शहर
2- जहत*--दिशा
3-  ज़ियाँ*--हानि

शहर में तेरे वो भी मौसम ऐ दिल आने वाले हैं

(105)

शहर में तेरे वो भी मौसम ऐ दिल आने वाले हैं
आन मिले के रिश्तों को भी लोग भुलाने वाले हैं

सोच के अपने ख़ालीपन को,बैन न कर हलकान न हो
ख़ुश्क नदी हम तेरे किनारे नीर बहाने वाले हैं

आँखों में खामोश हुए अब शोर मचाते आँसू भी
हिज़्र की शब, बर्फ़ीली रुत, सन्नाटे छाने वाले हैं

आना-जाना लगा रहेगा, तेरी बज़्म सजी रहे
कितने यार सिधार गए, अब हम भी जाने वाले हैं

सोच रहे थे बंद हवा की दावत दें तो कैसे दें
हमने देखा कुछ दीवाने दीप जलाने वाले हैं

बीत गया बरसात का मौसम और उन्हें अब लिखूँ क्या
जाड़ों के मेहमान परिंदे, लौट के आने वाले हैं

बुधवार, 5 सितंबर 2012

अब के भी यह रुत दिल को दुखाते हुए गुज़री

(104)

अब के भी यह रुत दिल को दुखाते हुए गुज़री
गुज़री है,  मगर नीर बहाते हुए गुज़री

जीने का ये अंदाज़ तो देखो कि मेरी उम्र
जीने के लिए ख़ुद को मनाते हुए गुज़री

काजल-सा बरसता था फ़िज़ा से कि मेरी रात
बे-तेल के दीपक को जलाते हुए गुज़री

गुज़री भी तो किस क़हर से गुज़री है ये पुरवा
सोए हुए ज़ख़्मों को जगाते हुए गुज़री

तरबीर ना मिल पाई तो क्या दुख कि शबे-ग़म
कुछ ख़्वाब तो पलकों पे सजाते हुए गुज़री

नाकाम ये कोशिश थी मगर हिज़्र की हर शब
खुद को, कभी दुनिया को भुलाते हुए गुज़री
1- तरबीर--स्वप्न-फल