मेरे लहू की आग
किस-किस के घर का नूर थी मेरे लहू की आग, जब बुझ गया तो फिर से जलाया गया मुझे।
मोम की बैशाखियाँ
शुक्रवार, 17 जून 2011
बियांबा की तरह
रिश्ते जो थे अज़ीज़ दिलों-जान की तरह
टूटे हैं तेरे शहर में ईमान की तरह
ऐ दश्त-ए-नामुराद मुझे अजनबी ना जान
मुझ में भी एक शय है बियांबा की तरह।
गुरुवार, 16 जून 2011
अंजान की तरह
उफ! क्या कहर था वो ताज़ा ताअरूफ का
लुत्फ भी...एक बार फिर मिलो मुझे अंजान की तरह.
शुक्रवार, 10 जून 2011
आज की रात
अगर आज की रात तुम आ सको तो तुम्हें मैं ये दिलचस्प मंजर दिखाउं
की अपने बिस्तर पे तन्हा पड़ा हूं...जिस्म सूली पर लटका हुआ है.
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