शनिवार, 10 सितंबर 2011

'दिल को झिझक, नज़र को हया* दे सकेंगे क्या'

(49)
दिल को झिझक, नज़र को हया* दे सकेंगे क्या
हम इस बरहनगी* को क़वा* दे सकेंगे क्या

इस दोपहर में राहते-अय्यामे-गुल* कहाँ
सोचो ये बर्गे-ख़ुश्क* हवा दे सकेंगे क्या

दिल बिन बियाही माँ की दुखी मामला-सा चुप
हम ज़िंदगी को प्यार भला दे सकेंगे क्या

हर शब वही डरावने ख़्वाबों का सिलिसला
सो भी गए तो ख़्वाब मज़ा दे सकेंगे क्या

बाक़ी है अपने पास बस इक लफ़्ज़ 'अलविदा'
आती रूतों को इसके सिवा दे सकेंगे क्या

1- हया*--लज्जा
2- बरहनगी*--नग्नता
3- क़वा*--कुर्ता
4- राहते-अय्यामे-गुल* --बसंत ऋतु का सुख
5- बर्गे-ख़ुश्क*--सूखे पत्ते

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

'कर चुकी आँख बहुत खून को पानी, साहब'

(48)
लोग हिज़यान* को देते हैं मआनी, साहब
रास आई न हमें सादा-बयानी, साहब

रास्ता भूल गए लोग घने जंगल में
किसने ये दिन में सुनाई है कहानी, साहब

सर पे सूरज है मगर ढूँढ़ रहे हैं अब भी
हम क़यामत में क़यामत की निशानी, साहब

आओ अब धूप में रूमाल सुखा लें अपने
कर चुकी आँख बहुत खून को पानी, साहब

अगले मौसम में बहुत फूल खिले थे, अब क्या
बंद भी कीजिए मरसिया-ख़्वानी*, साहब

जानते हैं कि नहीं जानते कुछ भी यानी
ख़ल इक हम पे हुई हेच-मदानी*, साहब

1- हिज़यान*-- उन्माद
2- मरसिया-ख़्वानी*--शोक करना
3- हेच-मदानी*--खुद को निम्न समझना

'पीछे पलटो पाओ गुमाँ'

(47)
पीछे पलटो पाओ गुमाँ*
उलटी सम्त बहाव गुमाँ

बाज़ू-बाज़ू दरिया तैर,
अगले घाट की नाव गुमाँ

बीते दिनों की यादों! जाओ
तुम भी अब बन जाओ गुमाँ

ग़ैर यक़ीनी हर इक शय
देखो सच बतलाओ गुमाँ

अंत ज़ियाँ* ऐ उम्र तेरा
ऊँचे-नीचे भाव गुमाँ

1- गुमाँ* --भ्रम
2- ज़ियाँ*--घाटा

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

'सूखी आँख से आँसू सोच'

(46)
कर्ब* का यह भी पहल सोच
सूखी आँख से आँसू सोच

ठोकर-ठोकर लम्स* उगा
सहरा-सहरा* ज़ानू* सोच

दर्द की बे-आवाज़ी सुन
कल के ज़ख़्म की ख़ुशबू सोच

अपने वज़्न को आप न जाँच
इक-इक हाथ तराज़ू सोच

चढ़ता चाँद, सरापा देख
बिखरे-टूटे बाज़ू सोच

रात औ दिन के बीच समय!
जलता-बुझता जुगनू सोच

1- कर्ब*--व्याकुलता
2- लम्स* --स्पर्श
3- सहरा-सहरा*--वन
4- ज़ानू*--गोद

'देखो यह महल और के हैं'

(44)
दलदली ताल हमारे हैं, कमल और के हैं
हमने तो पेड़ उगाए हैं कि फल और के हैं

मुझमें क्या मेरा है, क्या तेरा नहीं है, मत पूछ
ज़हन मेरा है, मगर उसमें ख़लल और के हैं

आज से पहले जो आए थे, वो कल मेरे थे
आज के बाद जो जो आएँगे वो कल और के हैं

साँस लेने का गुनहगार हूँ मैं भी, तुम भी
वर्ना यह और के लम्हे हैं, यह पल और के हैं

कोई मालिक है ज़मीनों का तो फ़सलों का कोई
नाम तेरा है मगर खेत में हल और के है

दुखभरी नींद के आलम में यह शाही सपने
तुम कहाँ आ गए, देखो यह महल और के हैं

'दिल के साथ-साथ हुआ है जिगर ख़राब'

(44)
कहते है जिसको हाल के है बर बसर ख़राब
जंगल कभी ख़राब था, अब है नगर ख़राब

कूचे में आशिक़ी के तअफ़्फ़ुन* बला का है
इतनी कहाँ थी, पहले कोई रहगुज़र ख़राब

समझे थे ख़ुशगवार हैं दिल की ख़राबियाँ
अब दिल के साथ-साथ हुआ है जिगर ख़राब

बाहर भटक रहे थे तो बस्ती ख़राब थी
अब घर में आ गए तो लगता है घर ख़राब

हमसे ख़राब-हाल कहाँ जाके चैन पाएँ
दुनिया इधर ख़राब है, उक़वा* उधर ख़राब

वो दिन गए कि छानते फिरते थे दश्त-दश्त
लगने लगा है अब तो मियाँ हर सफ़र ख़राब

1- तअफ़्फ़ुन*--दुर्गंध
2- उक़वा*--परलोक

'चाँद-तारों के बिखरने का सबब जानता है'

(43)
चाँद-तारों के बिखरने का सबब जानता है
दिल है सद्-रोख़्ना* मेरा, कोई यह कब जानता है

इश्क़ में भई तो जलाल अपना बचा कर रखा
वो मेरी खंदालबी*, मेरा ग़ज़ब* जानता है

दूर बैठा है तो क्या सारी ख़बर है उसको
वो मेरी सुबह, मेरा दिन, मेरी शब जानता है

दर्स* की चंद किताबें तो पढ़ी हैं उसने
मेरा फ़रजंद* बुजुर्गों का अदब जानता है

मै कि हूँ शाख़ से टूटा हुआ सूखा पत्ता
शहर में कौन मेरा नामो-नसब जानता है

1- सद्-रोख़्ना*--सौ सुराखों वाली छलनी
2- खंदालबी*--खुश मिजाजी
3- ग़ज़ब*--गुस्सा
4- दर्स* --पाठ्यक्रम
5- फ़रजंद*--पुत्र